
जैसे काहू बाजीगर चौहटै बजाइ ढोल,
नानारूप धरिकै भगल-विद्या ठानी है ।
तैसैं मैं अनादिकौ मिथ्यातकी तरंगनिसौं,
भरममैं धाइ बहु काय निज मानी है ॥
अब ज्ञानकला जागी भरमकी दृष्टि भागी,
अपनी पराई सब सौंज पहिचानी है ।
जाकै उदै होत परवांन ऐसी भांति भई,
निहचै हमारी जोति सोई हम जानी है ॥२८॥