
जैसै महा रतनकी ज्योतिमैं लहरि उठै,
जलकी तरंग जैसैं लीन होय जलमैं।
तैसैं सुद्ध आतम दरब परजाय करि,
उपजै बिनसै थिर रहै निज थलमैं ॥
ऐसै अविकलपी अजलपी अनंद रूपी,
अनादि अनंत गहि लीजै एक पलमैं ।
ताको अनुभव कीजै परम पीयूष पीजै,
बंधकौ विलास डारि दीजै पुदगलमैं ॥29॥