((छप्पय))
करम पिंड अरु रागभाव, मिलि एक हौहि नहि ।
दोऊ भिन्न-सरूप बसहिं, दोऊ न जीवमहि ॥
करमपिंड पुग्गल, विभाव रागादि मूढ़ भ्रम ।
अलख एक पुग्गल अनंत, किमि धरहि प्रकृति सम ॥
निज निज विलासजुत जगतमहि,
जथा सहज परिनमहि तिम ।
करतार जीव जड़ करमकौ,
मोह-विकल जन कहहि इम ॥35॥