((छप्पय))
जीव मिथ्यात्व न करै, भाव नहि धरै भरम मल ।
ज्ञान ज्ञानरस रमै, होइ करमादिक पुदगल ॥
असंख्यात परदेस सकति, जगमगै प्रगट अति ।
चिदविलास गंभीर धीर, थिर रहै विमलमति ॥
जब लगि प्रबोध घटमहि उदित,
तब लगि अनय न पेखिये ।
जिमि धरम-राज वरतंत पुर,
जहं तहं नीति परेखिये ॥36॥