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मंगलाचरण
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(तर्ज : कविता मात्रिक)
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जाके उदै होत घट-अंतर,
बिनसै मोह-महातम-रोक ।
सुभ अरु असुभ करमकी दुविधा,
मिटै सहज दीसै इक थोक ॥
जाकी कला होत संपूरन,
प्रतिभासै सब लोक अलोक।
सो प्रबोध-ससि निरखि बनारसि,
सीस नवाइ देत पग धोक ॥२॥