((चौपाई))
कोऊ सिष्य कहै गुरु पांहीं,
पाप पुन्न दोऊ सम नाहीं ॥
कारन रस सुभाव फल न्यारे,
एक अनिष्ट लगैं इक प्यारे ॥४॥