((सवैया इकतीसा))
पाप बंध पुन्न बंध दुहूंमै मुकति नाहि,
कटुक मधुर स्वाद पुग्गलकौ पेखिए ।
संकलेस विसुद्ध सहज दोऊ कर्मचाल,
कुगति सुगति जगजालमै विसेखिए ॥
कारनादि भेद तोहि सूझत मिथ्यात मांहि,
ऐसौ द्वैत भाव ग्यान दृष्टिमैं न लेखिए ।
दोऊ महा अंधकूप दोऊ कर्मबंधरूप,
दुईकौ विनास मोख मारगमै देखिए ॥६॥