((सवैया इकतीसा))
जौलौं अष्ट कर्मको विनास नांही सरवथा,
तौलौं अंतरातमामैं धारा दोइ बरनी ।
एक ज्ञानधारा एक सुभासुभ कर्मधारा,
दुहूंकी प्रकृति न्यारी न्यारी न्यारी धरनी ॥
इतनौ विसेस जु करमधारा बंधरूप,
पराधीन सकति विविध बंध करनी ।
ज्ञानधारा मोखरूप मोखकी करनहार,
दोखकी हरनहार भौ-समुद्र-तरनी ॥१४॥