((सवैया इकतीसा))
पूरव अवस्था जे करम-बंध कीने अब,
तेई उदै आइ नाना भांति रस देत हैं ।
केई सुभ साता कोई असुभ असातारूप,
दुहूंसौं न राग न विरोध समचेत हैं ॥
जथाजोग क्रिया करैं फलकी न इच्छा धरैं,
जीवन-मुकतिकौ बिरद गहि लेत हैं,
यातें ज्ञानवंतकौं न आस्रव कहत कोऊ,
मुद्धतासौं न्यारे भए सुद्धता समेत हैं ॥७॥