((सवैया तेवीसा))
जो कबहुं यह जीव पदारथ,
औसर पाइ मिथ्यात मिटावे ।
सम्यक धार प्रबाह बहै गुन,
ज्ञान उदै मुख ऊरध धावै ॥
तो अभिअंतर दर्वित भावित,
कर्म कलेस प्रवेस न पावै ।
आतम साधि अध्यातमके पथ,
पूरन है परब्रह्म कहावै ॥४॥