((सवैया तेवीसा))
भेदि मिथ्यात सु वेदि महारस, भेद-विज्ञान कला जिन्ह पाई ।
जो अपनी महिमा अवधारत, त्याग करैं उर सौंज पराई ।
उद्धत रीति फुरी जिन्हके घट, होत निरंतर जोति सवाई ।
ते मतिमान सुवर्न समान, लगै तिन्हकौं न सुभासुभ काई ॥५॥