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श्री
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अथ-परमर्षि-स्वस्ति-मंगल-विधान

18 बुद्धि ऋद्धियाँ
तर्ज : छुपा लो आँचल में प्यार
नित्याप्रकंपाद्भुत-केवलौघाः, स्फुरन्मनः पर्यय-शुद्धबोधाः
दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥१॥
नित्य अद्भुत अचल केवलज्ञानधारी जे मुनी ।
मनःपर्यय ज्ञानधारक, यती तपसी वा गुणी ॥
दिव्य अवधिज्ञान धारक, श्री ऋषीश्वर को नमूँ ।
कल्याणकारी लोक में, कर पूज वसु विधि को वमूँ ॥१॥
अन्वयार्थ : अविनाशी अचल अद्भुत केवल ज्ञान के धारक मुनिराज, दैदीप्यमान मन: पर्यय ज्ञान रूप शुद्ध ज्ञान वाले मुनिराज और दिव्य अवधिज्ञान के बल से प्रबुद्ध महा ऋद्धि धारी ऋषि हमारा कल्याण करें ।
कोष्ठस्थ-धान्योपममेकबीजं, संभिन्न-संश्रोतृ-पदानुसारि
चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥२॥
कोष्ठस्थ धान्योपम कही, अरु एक बीज कही प्रभो ।
संभिन्न संश्रोतृ पदानुसारी, बुद्धि ऋद्धि कही विभो ॥
ये चार ऋद्धीधर यतीश्वर, जगत जन मंगल करें ।
अज्ञान-तिमिर विनाश कर, कैवल्य में लाकर धरें ॥२॥
अन्वयार्थ : कोष्ठ-बुद्धि, एक-बीज, संभिन-संश्रोतृत्व और पादानुसारणी इन चार प्रकार की बुद्धि ऋद्धि को धारण करने वाले ऋषीराज हम सबका मंगल करें ।
4) [कोष्ठ-बुद्धि ऋद्धि] - जिस प्रकार भंडार में हीरा, पन्ना पुखराज चाँदी सोना धान्य आदि जहाँ रख दिए जावे बहुत समय बीत जाने पर यदि वे निकाले जावे तो जैसे के तैसे न कम न अधिक भिन्न भिन्न उसी स्थान पर रखे मिलते हैं तैसे ही सिद्धान्त न्याय व्याकरणादि के सूत्र गद्य पद्य ग्रन्थ जिस प्रकार पढे थे सुने थे पढाये अथवा मनन किए थे बहुत समय बीत जाने पर भी यदि पूछा जाए तो न एक भी अक्षर घट कर, न बढ़कर, न पलट कर, भिन्न-भिन्न ग्रन्यों को सुना दे ऐसी शक्ति ।
5) [एक बीज ऋद्धि] - ग्रन्थों के एक बीज अर्थात् मूल पद के द्वारा उसके अनेक प्रकार के अर्थों को जान लेना ।
6)[ संभिनसंश्रोतृत्व ऋद्धि] - बारह योजन लम्बे नौ योजन चौड़े क्षेत्र में ठहरने वाली चक्रवर्ती की सेना के हाथी, घोडा, ऊँट, बैल, पक्षी, मनुष्य आदि सभी के अक्षर अनक्षर रूप नाना प्रकार के शब्दों को एक साथ अलग अलग सुनने की शक्ति ।
7) [पादानुसारणी ऋद्धि] - ग्रन्थ के आदि के, मध्य के या अन्त के एक पद को सुनकर सम्पूर्ण ग्रन्थ को कह देने की शक्ति ।
8) [दूर-स्पर्शन ऋद्धि] - मनुष्य यदि दूर से स्पर्शन करना चाहे तो अधिक से अधिक नौ योजन दूरी के पदार्थों का स्पर्शन जान सकता है । किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से संख्यात योजन दूरवर्ती पदार्थ का स्पर्शन कर लेते है ।
संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि
दिव्यान् मतिज्ञान-बलाद्वहंतः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥३॥
दिव्य मति के बल ग्रहण, करते स्पर्शन घ्राण को ।
श्रवण आस्वादन करें, अवलोकते कर त्राण को ॥
पंच इंद्री की विजय, धारण करें जो ऋषिवरा ।
स्व-पर का कल्याण कर, पायें शिवालय ते त्वरा ॥३॥
अन्वयार्थ : दिव्य मति ज्ञान के बल से दूर से ही स्पर्शन, श्रवण, आस्वादन, घाण और अवलोकन रूप पाँच इन्द्रियों के विषयों धारण करने वाले ऋषीराज हम लोगों का कल्याण करें ।
9) [दूर-श्रवण ऋद्धि] - मनुष्य यदि दूरवर्ती शब्द को सुनना चाहे तो बारह योजन तक के दूरवर्ती शब्द सुन सकता है अधिक नहीं, किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञादि के बल से संख्यात योजन दूरवर्ती शब्द सुन लेते हैं ।
10) [दूर-आस्वादन ऋद्धि] - मनुष्य अधिक से अधिक नौ योजन दूर पदार्थो का रस जान सकता है किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से संख्यात योजन दूर स्थित पदार्थ का रस जान लेते हैं ।
11) [दूर-घ्राण ऋद्धि] - मनुष्य अधिक से अधिक नौ योजन दूर स्थित पदार्थ की गंध ले सकता है किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से संख्यात योजन दूर स्थित पदार्थो की गंध जान लेते हैं ।
12) [दूरावलोकन ऋद्धि] - मनुष्य अधिकतम सैतालीस हजार दो सौ त्रेसठ योजन दूर स्थित पदार्थ को देख सकता है, किन्तु मुनिराज दिव्य मतिज्ञानादि के बल से हजारों योजन दूर स्थित पदार्थो को देख लेते है ।
प्रज्ञा-प्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः, प्रत्येकबुद्धाः दशसर्वपूर्वै:
प्रवादिनोऽष्टांग-निमित्त-विज्ञाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥४॥
प्रज्ञा प्रधाना श्रमण अरु प्रत्येक बुद्धि जो कही ।
अभिन्न दश पूर्वी चतुर्दश-पूर्व प्रकृष्ट वादी सही ॥
अष्टांग महा निमित्त विज्ञा, जगत का मंगल करें ।
उनके चरण में अहर्निश, यह दास अपना शिर धरे ॥४॥
अन्वयार्थ : प्रज्ञा, श्रमण, प्रत्येक-बुद्ध, अभिन्न-दशपूर्वी, चतुर्दश-पूर्वी, प्रवादित्व, अष्टांग-महानिमित्तज्ञ मुनिवर हमारा कल्याण करें ।
13)[ प्रज्ञा-श्रमणत्व ऋद्धि] - जिस ऋद्धि के बल से पदार्थो के अत्यन्त सूक्ष्म तत्वों को जिनको की केवली एवं श्रुत केवली ही बतला सकते हैं द्वादशांग चौदह पूर्व पढ़े बिना ही बतला देते हैं ।
14) [प्रत्येक-बुद्ध ऋद्धि] - अन्य किसी के उपदेश के बिना ही जिस शक्ति के द्वारा ज्ञान संयम व्रत का विधान निरुपण किया जाता है ।
15) [दशपूर्वित्व ऋद्धि] - दसवां पूर्व पढने से अनेक महा-विद्याओं के प्रकट होने पर भी चारित्र से चलायमान नहीं होना ।
16) [चतुर्दश-पूर्वित्व ऋद्धि] - सम्पूर्ण श्रुत ज्ञान प्राप्त हो जाना ।
17) [प्रवादित्व ऋद्धि] - जिस शक्ति के द्वारा क्षुद्रवादियों की तो क्या यदि इन्द्र भी शास्त्रार्थ करने आए तो उसे भी निरुत्तर कर दे ।
18) [अष्टांग-महानिमित्त ऋद्धि] - अन्तरिक्ष, भौम, अंग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न, स्वप्न इन आठ महा-निमित्तों का ज्ञान ।

नौ चारण ऋद्धियाँ
जंघा-वह्रि-श्रेणि-फलांबु-तंतु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वाः
नभोऽगंण-स्वैर-विहारिणश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥५॥
जंघावलि अरु श्रेणि तंतु, फलांबु बीजांकुर प्रसून ।
ऋद्धि चारण धार के मुनि, करत आकाशी गमन ॥
स्वच्छंद करत विहार नभ में, भव्यजन के पीर हर ।
कल्याण मेरा भी करें, मैं शरण आया हूँ प्रभुवर ॥५॥
अन्वयार्थ : जंघा, अग्नि शिखा, श्रेणी, फल, जल, तन्तु, पुष्प, बीज, और अंकुर पर चलने वाले चारण बुद्धि के धारक तथा आकाश में स्वच्छ विहार करने वाले मुनिराज हमारा कल्याण करें ।
1) [जंघा-चारण ऋद्धि] - पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर आकाश में जंघा को बिना उठाये सैकडों योजन गमन करने की शक्ति ।
2) [अग्नि-शिखाचारण ऋद्धि] - अग्नि शिखा पर गमन करने से अग्नि शिखाओं में स्थित जीवों की विराधना नहीं होती ।
3) [श्रेणी-चारण ऋद्धि] - आकाश श्रेणी में गमन करते हुए सब जाति के जीव की रक्षा करना ।
4) [फल-चारण ऋद्धि] - आकाश में गमन करते हुए फलों पर भी चले तो भी किसी प्रकार जीवों की हानि नहीं होती ।
5) [जल-चारण ऋद्धि] - जल पर गमन करने से भी जीवों की हिंसा न हो ।
6) [तन्तु-चारण ऋद्धि] - तन्तु अर्थात् मकड़ी के जाले के समान तन्तुओं पर भी चले तो वे टूटते नहीं ।
7) [पुष्प-चारण ऋद्धि] - फूलों पर गमन करने से उनमें स्थित जीवों की विराधना नहीं होती ।
8) [बीजांकुर-चारण ऋद्धि] - बीजरूप पदार्थो एवं अंकुरों पर गमन करने से उन्हें किसी प्रकार हानि नहीं होती ।
9) [नभ-चारण ऋद्धि] - कायोत्सर्ग की मुद्रा में पद्मासन या खडगासन में गमन करना ।


तीन बल ऋद्धियाँ
अणिम्नि दक्षाः कुशलाः महिम्नि,लघिम्नि शक्ताः कृतिनो गरिम्णि
मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्यं, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥६॥
अणिमा जु महिमा और गरिमा में कुशल श्री मुनिवरा ।
ऋद्धि लघिमा वे धरें, मन-वचन-तन से ऋषिवरा ॥
हैं यदपि ये ऋद्धिधारी, पर नहीं मद झलकता ।
उनके चरण के यजन हित, इस दास का मन ललकता ॥६॥
अन्वयार्थ : अणिमा, महिमा, लघिमा और गरिमा ऋद्धि में कुशल तथा मन, वचन, काय बल ऋद्धि के धारक मुनिराज हमारा कल्याण करें ।
1) [मनो-बल ऋद्धि] - अन्तर्मुहूर्त में ही समस्त द्वादशांग के पदार्थो को विचार लेना ।
2) [वचन-बल ऋद्धि] - सम्पूर्ण श्रुत का अन्तर्मुहूर्त में पाठ कर लेना फिर जिव्हा, कंठ आदि में शुष्कता एवं थकावट न होना ।
3) [काय-बल ऋद्धि] एक मास चातुर्मासिक आदि बहुत समय तक कायोत्सर्ग करने पर भी शरीर का बल कान्ति आदि थोड़ा भी कम न होना एवं तीनों लोकों को कनिष्ठ अंगुली पर उठाने की सामर्थ्य का होना ।
1) [अणिमा ऋद्धि] - परमाणु के समान अपने शरीर को छोटा बना लेना ।
2) [महिमा ऋद्धि] - सुमेरु पर्वत सें भी बड़ा शरीर बना लेना ।
3) [लघिमा ऋद्धि] - वायु से भी हल्का शरीर बना लेना ।
4) [गरिमा ऋद्धि] - वज्र से भी भारी शरीर बना लेना ।

ग्यारह विक्रिया ऋद्धियाँ
सकामरुपित्व-वशित्वमैश्यं, प्राकाम्यमन्तर्द्धिमथाप्तिमाप्ताः
तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥७॥
ईशत्व और वशित्व, अन्तर्धान आप्ति जिन कही ।
कामरूपी और अप्रतिघात, ऋषि पुंगव लही ॥
इन ऋद्धि-धारक मुनिजनों को, सतत वंदन मैं करूँ ।
कल्याणकारी जो जगत में, सेय शिव-तिय को वरूँ ॥७॥
अन्वयार्थ : कामरुपित्व, वशित्व, ईशित्व, प्राकम्य, अन्तर्धान, आप्ति तथा अप्रतिघात विक्रिया ऋद्धि से सम्पन्न मुनिराज हमारा कुशल करें ।
5) [कामरुपित्व ऋद्धि] - एक साथ अनेक आकार वाले अनेक शरीरों को बना लेना।
6) [वशित्व ऋद्धि] - तप बल से सभी जीवों को अपने वश में कर लेना।
7) [ईशित्व ऋद्धि] - तीन लोक की प्रभुता होना ।
8) [प्राकम्य ऋद्धि] - जल में पृथ्वी की तरह और पृथ्वी में जल की तरह चलना
9) [अन्तर्धान ऋद्धि] - तुरन्त अदृश्य होने की शक्ति ।
10) [आप्ति ऋद्धि] - भूमि पर बैठे हुए ही अंगुली से सुमेरू पर्वत की चोटी सूर्य और चन्द्रमा को छू लेना ।
11) [अप्रतिघात ऋद्धि] - पर्वतों के मध्य से खुले मैदान के समान आना-जाना रुकावट न आना ।

सात तप ऋद्धियाँ
दीप्तं च तप्तं च तथा महोग्रं, घोरं तपो घोर पराक्रमस्थाः
ब्रह्मापरं घोर गुणाश्चरन्तः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥८॥
दीप्ति तप्ता महा घोरा, उग्र घोर पराक्रमा ।
ब्रह्मचारी ऋद्धिधारी, वनविहारी अघ वमा ॥
ये घोर तपधारी परम गुरु, सर्वदा मंगल करें ।
भव डूबते इस अज्ञजन को, तार तीरहि ले धरें ॥८॥
अन्वयार्थ : दीप्ति, तप्त, महाउग्र, घोर तप, और घोर पराक्रम, के तथा अघोर-ब्रह्मचर्य इन सात तप ऋद्धि के धारी मुनिराज हमारा कल्याण करें ।
1) [दीप्ति ऋद्धि] - बड़े-बड़े उपवास करते हुए भी मनोबल, वचन बल का यवल का बढ़ना शरीर में सुगंधि आना, सुगंधित निश्वास निकलना, तथा शरीर में म्लानता न होकर महा कान्ति का होना ।
2) [तप्त ऋद्धि] - भोजन से मलमूत्र रक्त मांस आदि का न बनना गरम कढ़ाही में पानी की तरह सूख जाना ।
3) [महाउग्र ऋद्धि] - एक दो चार छह पक्ष मास उपवास आदि में से किसी एक को धारण करके मरण पर्यन्त न छोड़ना ।
4) [घोर तप ऋद्धि] - भयानक रोगों से पीड़ित होने पर भी उपवास व काय क्लेश आदि से नहीं हटना ।
5) [घोर-पराक्रम ऋद्धि] - दुष्ट राक्षस पिशाच के निवास स्थान भयानक जानवरों से व्याप्त पर्वत, गुफा श्मशान सूनें गाँव में निवास करने वाले समुद्र के जल को सुखा देना एवं तीनों लोकों को उठा के फैंक देने की सामर्थ्य ।
6) [महाघोर ऋद्धि] - सिंह निक्रीडित आदि महा उपवासों को करते रहना ।
7) [अघोर ब्रह्मचर्य ऋद्धि] - चिरकाल तक तपश्चरण करने के कारण स्वप्न में भी ब्रह्मचर्य से न डिगना आदि विकार परिस्थिति मिलने पर भी ब्रह्मचर्य में दृढ़ रहना ।

आठ औषधि ऋद्धियाँ
आमर्ष-सर्वौषधयस्तथाशीर्विषाविषा दृष्टिविषाविषाश्च
स-खिल्ल-विड्ज्जल-मलौषधीशाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥९॥
आमर्ष औषधि आषि विष, अरु दृष्टि विष सर्वौषधि ।
खिल्ल औषधि जल्ल औषधि, विडौषधि मल्लौषधि ॥
ये ऋद्धिधारी महा मुनिवर, सकल संघ मंगल करें ।
जिनके प्रभाव सभी सुखी हों, और भव-जलनिधि तरें ॥९॥
अन्वयार्थ : आमर्शोषधि, सर्वोषधि, आशीअविष, दृष्टि विष, क्ष्वेलौषधि, विडौषधि, जल्लौषधि, मलौषधि, आशीविष रस, दृष्टि विष रस के धारी परम ऋषि हमारा कल्याण करें ।
1) [आमर्शोषधि ऋद्धि] - जिनके हाथ पैर आदि को छूने से एवं समीप आने मात्र से ही सब रोग दूर हो जाए ।
2) [सर्वोषधि ऋद्धि] - जिनके समस्त शरीरके स्पर्श करने वाली वायु ही समस्त रोगो को दूर कर देती है ।
3) [आशीअविष ऋद्धि] - महाविष व्याप्त पुरुष भी जिनके आशीर्वाद रूप शब्द सुनने से निरोग या निर्विष हो जाता है ।
4) [दृष्टि (दष्टिनिर्विष) विष ऋद्धि] - महाविष व्याप्त पुरुष भी जिनकी दृष्टि से निर्विष हो जाए ।
5) [क्ष्वेलौषधि ऋद्धि] - जिनके थूक, कफ आदि से लगी हुई हवा के स्पर्श से ही रोग दूर हो जावे ।
6) [विडौषधि ऋद्धि] - जिनके मल (विष्ठा) से स्पर्श की हुई वायु ही रोग नाशक हो ।
7) [जल्लौषधि ऋद्धि] - जिनके शरीर के पसीने में लगी हुई धूल महारोग नाशक होती है ।
8) [मलौषधि ऋद्धि] - जिनके दांत, कान, नाक, नेत्र आदि का मैल सर्व रोग नाशक होता है ।
1) [आशीविष रस ऋद्धि] - जिन मुनि के कर्म उदय से क्रोधपूर्वक मर जाओ शब्द निकल जाय तो वह व्यक्ति तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
2) [दृष्टि विष रस ऋद्धि] - मुनि की क्रोध पूर्ण दृष्टि जिस व्यक्ति पर पड़ जाये वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।

छह रस ऋद्धियाँ एवं दो अक्षीण ऋद्धियाँ
क्षीरं स्रवंतोऽत्र घृतं स्रवंतः, मधु स्रवंतोऽप्यमृतं स्रवंतः
अक्षीणसंवास-महानसाश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥१०॥
क्षीरस्रावी मधुस्रावी घृतस्रावी मुनि यशी ।
अमृतस्रावी ऋद्धिवर, अक्षीण संवास महानसी ॥
ये ऋद्धिधारी सब मुनीश्वर, पाप-मल को परिहरैं ।
पूजा-विधि के प्रथम अवसर, आ सफल पूजा करें ॥१०॥
अन्वयार्थ : क्षीरस्रावी, घृतस्रावी, मधुस्रावि, अमृतस्रावि तथा अक्षीण संवास और अक्षीण महानस ऋद्धि धारी मुनिवर हमारे लिए मंगल करें ।
3) [क्षीरस्रावी ऋद्धि] - नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही दूध के समान गुणकारी हो जावे अथवा जिनके वचन सुनने से क्षीण पुरुष भी दूध के समान बल को प्राप्त करे ।
4) [घृतस्रावी ऋद्धि] - नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही घी के समान बलवर्धक हो जाए एवं जिनके वचन घृत के समान तृप्ति करें ।
5) [मधुस्रावि ऋद्धि] - नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही मधुर हो जाए अथवा जिनके वचन सुनकर दुःखी प्राणी भी साता का अनुभव करे ।
6) [अमृतस्रावि ऋद्धि] - नीरस भोजन भी जिनके हाथों में आते ही अमृत के समान पुष्टि कारक हो जाए अथवा जिनके वचन अमृत के समान आरोग्य कारी हो ।
1) [अक्षीण संवास ऋद्धि] - जिनके निवास स्थान में इन्द्र, देव, चक्रवर्ती की सेना भी बिना किसी परस्पर विरोध के ठहर सके उसे अक्षीण संवास ऋद्धि कहते है ।
2) [अक्षीण महानस ऋद्धि] - ऋद्धिधारी मुनिराज जिस पात्र आहार करे उस दिन उस पात्र में बचा हुआ आहार चक्रवर्ती की सेना भी कर जाये तब भी आहार कम नहीं पड़े ।
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