हमकौ कछू भय ना रे, जान लियौ संसार ॥टेक ॥
जो निगोद में सो ही मुझमें, सो ही मोक्ष मँझार ।
निश्चय भेद कछू भी नाहीं भेद गिनैं संसार ॥
हमकौ कछू भय ना रे, जान लियौ संसार ॥१॥
परवश ह्वै आपा विसारि के, राग द्वेष कौं धार ।
जीवत मरत अनादि कालतें, यौंही है उरझार ॥
हमकौ कछू भय ना रे, जान लियौ संसार ॥२॥
जाकरि जैसैं जाहि समयमें, जो होवत जा द्वार ।
सो बनि है टरि है कछु नाहीं, करि लीनौं निरधार ॥
हमकौ कछू भय ना रे, जान लियौ संसार ॥३॥
अग्नि जरावै पानी बोवै, बिछुरत मिलत अपार ।
सो पुद्गल रूपी मैं बुधजन, सबकौ जाननहार ॥
हमकौ कछू भय ना रे, जान लियौ संसार ॥४॥
अर्थ : कवि कहते हैं कि मुझे अब किसी भी प्रकार का डर या भय नहीं है क्योंकि अब मैंने संसार के स्वरूप को जान लिया है।
जैसा मैं निगोद की अवस्था में था वैसा ही अभी हूँ तथा वैसा ही मोक्ष में रहने वाला हूँ । निश्चय दृष्टि से देखें तो निगोद और मोक्ष की अवस्था में कोई अन्तर नहीं है, और जो इनमें भेद गिनते हैं वह सब व्यवहार दृष्टि वाले संसारी हैं।
हे जीव ! तू पर द्रव्यों के वशीभूत होकर आत्मा को भूलकर राग-द्वेष के परिणाम ही करता आ रहा है । जिसके कारण तू अनादि काल से जन्म - मरण के महादुःख पीड़ा को भोग रहा है।
जिस द्रव्य का जिस विधि से, जिस प्रकार से, जिस समय में जो होना सुनिश्चित है, वह होकर ही रहेगा और इसमें कुछ भी परिवर्तन संभव नहीं है - ऐसा मुझे आज निर्णय हो चुका है ।
बुधजन कवि कहते हैं कि जैसे अग्नि का स्वरूप जलाने का और पानी का स्वरूप डुबोने का है उसी प्रकार इस पुदगल शरीर का प्रभाव बिछुड़ने और मिलने का है और मैं तो इन सबको जानने वाला आतमराम हूँ।