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श्री
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थारा तो बैनामें सरधान
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थारा तो बैनामें सरधान घणो छै, म्हारे छवि निरखत हिय सरसावै ।
तुम धुनि-घन पर-चहन-दहन-हर, वर समता-रस झर बरसावै ॥
रूप निहारत ही बुधि हो सो, निज-पर चिह्न जुदे दरसावै ।
मैं चिदंक अलंकक अमल थिर, इन्द्रियसुख-दुख जड़ फरसावै ॥
ज्ञान-विराग सुगुण तुम तिनकी, प्रापति हित सुरपति तरसावै ।
मुनि बड़भाग लीन तिनमें नित, 'दौल' धवल उपयोग रसावै ॥



अर्थ : हे जिनेन्द्र देव ! आपके वचनों मे मेरी बहुत श्रद्धा है। मेरा हृदय आपकी मुद्रा देखकर बहुत आनन्दित होता है। हे प्रभो ! आपकी दिव्यध्वनि के बादल, परपदार्थों की चाहरूपी आग को बुझाने के लिए श्रेष्ठ समता-रस की भारी वर्षा करते हैं।
आपका रूप देखते ही हृदय मे ऐसा विवेक प्रगट हो जाता है जो स्व और पर को अपने-अपने चिह्नों द्वारा भिन्‍न-भिन्‍न दिखाई देता है। यथा, मै तो चैतन्यस्वरूपी निर्दोष, निर्मल एव स्थिर तत्त्व हूँ, जबकि ये इन्द्रियसुख-दुख अचेतन है, स्पर्शमयी पुदगल हैं।
कविवर दौलतराम कहते है कि हे जिनेन्द्रदेव ! आपके जिन ज्ञान-वैराग्य आदि श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिए इन्द्र भी तरसता है, और जिनमें महाभाग्यशाली मुनिराज भी सदा लीन रहते है, उन्हीं ज्ञान-वैराग्य आदि उत्तम गुणों में मै भी अपना स्वच्छ उपयोग रमाता हूँ ।
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