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देव-शास्त्र-गुरु
पण्डित राजमल पवैया कृत

वीतराग अरिहंत देव के पावन चरणों में वन्दन ।
द्वादशांग श्रुत श्री जिनवाणी जग कल्याणी का अर्चन ॥
द्रव्य भाव संयममय मुनिवर श्री गुरु को मैं करूँ नमन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरु-समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरु-समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

आवरण ज्ञान पर मेरे है, हूँ जन्म-मरण से सदा दुखी ।
जबतक मिथ्यात्व हृदय में है, यह चेतन होगा नहीं सुखी ॥
ज्ञानावरणी के नाश हेतु चरणों में जल करता अर्पण ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरुभ्यः जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशाय जलं निर्वपामीति स्वाहा

दर्शन पर जब तक छाया है, संसार ताप तब तक ही है ।
जब तक तत्वों का ज्ञान नहीं, मिथ्यात्व पाप तब तक ही है ॥
सम्यक्श्रद्धा के चंदन से मिट जायेगा दर्शनावरण ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्र गुरुभ्यः संसार-ताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा

निज स्वभाव चैतन्य प्राप्ति हित, जागे उर में अन्तरबल ।
अव्याबाधित सुख का घाता वेदनीय है कर्म प्रबल ॥
अक्षत चरण चढ़ाकर प्रभुवर वेदनीय का करूं दमन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

मोहनीय के कारण यह चेतन अनादि से भटक रहा ।
निज स्वभाव तज पर-द्रव्यों की ममता में ही अटक रहा ॥
भेदज्ञान की खड़ग उठाकर मोहनीय का करूँ हनन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

आयु-कर्म के बंध उदय में सदा उलझता आया हूँ ।
चारों गतियों में डोला हूँ, निज को जान न पाया हूँ ॥
अजर-अमर अविनाशी पदहित आयु कर्म का करूँ शमन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः क्षुधा-रोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा

नाम कर्म के कारण मैंने, जैसा भी शरीर पाया ।
उस शरीर को अपना समझा, निज चेतन को विसराया ॥
ज्ञानदीप के चिर प्रकाश से, नामकर्म का करूँ दमन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा

उच्च-नीच कुल मिला बहुत पर निज कुल जान नहीं पाया ।
शुद्ध-बुद्ध चैतन्य निरंजन सिद्ध स्वरूप न उर भाया ॥
गोत्र-कर्म का धूम्र उड़ाऊँ निज परिणति में करूँ नमन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः अष्ट कर्मविध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा

दान-लाभ भोगोपभोग बल मिलने में जो बाधक है ।
अन्तराय के सर्वनाश का, आत्मज्ञान ही साधक है ॥
दर्शन ज्ञान अनन्त वीर्य सुख, पाऊँ निज आराधक बन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा

कर्मोदय में मोह रोष से, करता है शुभ-अशुभ विभाव ।
पर में इष्ट-अनिष्ट कल्पना, राग-द्वेष विकारी भाव ॥
भाव-कर्म करता जाता है, जीव भूल निज आत्मस्वभाव ।
द्रव्य-कर्म बंधते हैं तत्क्षण, शाश्वत सुख का करे अभाव ॥
चार-घातिया चउ अघातिया अष्ट-कर्म का करूँ हनन ।
देव-शास्त्र-गुरु के चरणों का बारम्बार करूँ पूजन ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(जयमाला)
हे जगबन्धु जिनेश्वर तुमको अब तक कभी नहीं ध्याया ।
श्री जिनवाणी बहुत सुनी पर कभी नहीं श्रद्धा लाया ॥

परम वीतरागी सन्‍तों का भी उपदेश न मन भाया ।
नरक तिर्यञ्च देव नरगति में भ्रमण किया बहु दुख पाया ॥

पाप-पुण्य में लीन हुआ निज शुद्ध-भाव को बिसराया ।
इसीलिये प्रभुवर अनादि से, भव अटवी में भरमाया ॥

आज तुम्हारे दर्शन कर, प्रभु मैंने निज दर्शन पाया ।
परम शुद्ध चैतन्य ज्ञानघन, का बहुमान हृदय आया ॥

दो आशीष मुझे हे जिनवर, जिनवाणी गुरुदेव महान ।
मोह महातम शीघ्र नष्ट हो, जाये करूँ आत्म कल्याण ॥

स्वपर विवेक जगे अन्तर में, दो सम्यक्‌ श्रद्धा का दान ।
क्षायक हो उपशम हो हे प्रभु, क्षयोपशम सद्दर्शन ज्ञान ॥

सात तत्व पर श्रद्धा करके देव शास्त्र गुरु को मानूँ ।
निज-पर भेद जानकर केवल निज में ही प्रतीत ठानूँ ॥

पर-द्रव्यों से मैं ममत्व तज आत्म-द्रव्य को पहिचानूं ।
आत्म-द्रव्य को इस शरीर से पृथक भिन्न निर्मल जानूँ ॥

समकित रवि की किरणें, मेरे उर अन्तर में करें प्रकाश ।
सम्यक्ज्ञान प्राप्त कर स्वामी, पर-भावों का करूँ विनाश ॥

सम्यक्चारित को धारण कर, निज स्वरूप का करूँ विकास ।
रत्नत्रय के अवलम्बन से, मिले मुक्ति निर्वाण निवास ॥

जय जय जय अरहन्त देव, जय जिनवाणी जग कल्याणी ।
जय निर्ग्रन्थ महान सुगुरु, जय जय शाश्वत शिवसुखदानी ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(दोहा)
देव शास्त्र गुरु के वचन भाव सहित उरधार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार ॥
(इत्याशिर्वादः ॥ पुष्पांजलिं क्षिपेत ॥)