nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here

भाई जानो पुद्गल न्यारा रे
Karaoke :
राग : काफी

भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...
क्षीर नीर जड़ चेतन जानो, धातु पखान विचारा रे ॥टेक॥

जीव करम को एक जाननो, भाख्यो श्रीगणधारा रे ।
इस संसार दुःखसागर में, तोहि भ्रमावनहारा रे
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥१॥

ग्यारह अंग पढ़े सब पूरब, भेद-ज्ञान न चितारा रे ।
कहा भयो सुवटाकी नाईं, रामरूप न निहारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥२॥

भवि उपदेश मुकत पहुँचाये, आप रहे संसारा रे ।
ज्यों मलाह पर पार उतारै, आप बारका वारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥३॥

जिनके वचन ज्ञान परगासैं, हिरदै मोह अपारा रे ।
ज्यों मशालची और दिखावै, आप जात अँधियारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥४॥

बात सुनैं पातक मन नासै, अपना मैल न झारा रे ।
बांदी परपद मलि मलि धोवै, अपनी सुधि न संभारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥५॥

ताको कहा इलाज कीजिये, बूड़ा अम्बुधि धारा रे ।
जाप जप्यो बहु ताप तप्यो पर, कारज एक न सारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥६॥

तेरे घट अन्तर चिनमूरति, चेतन पद उजियारा रे ।
ताहि लखै तासौं बनि आवै, 'द्यानत' लहि भव पारा रे ॥
भाई! जानो पुद्गल न्यारा रे ...॥७॥



अर्थ : अरे भाई ! इस पुद्गल को अपने से (आत्मा से) भिन्न अर्थात् न्यारा जानो । जैसे दूध व पानी और धातु व पाषाण भिन्न-भिन्न हैं, वैसे ही जड़ व चेतन भिन्न-भिन्न हैं, ऐसा विचार करो ।

श्री गणधरदेव ने कहा है कि जो जीव आत्मा व कर्म को एक रूप जानता है वह इस संसार के दु:खों के सागर में भ्रमता ही रहता है, भटकता ही रहता है ।

ग्यारह अंग और नौ पूर्व पढ़ लिए, उन्हें तोते की भाँति रट लिए, परन्तु देह और आत्मा के बीच भेद-ज्ञान नहीं किया, नहीं जाना तो उसने अपने शिव-स्वरूप को नहीं देखा, उसकी झलक भी नहीं पाई ।

ऐसा व्यक्ति दूसरों को उपदेश देता रहता है, उसका उपदेश सुनकर प्राणी मुक्त हो जाते हैं, परन्तु वह स्वयं इस संसार में ही रह जाता है । जैसे मल्लाह दूसरे को तो किनारे पर उतार देता है, पर नैया को नहीं छोड़ने के कारण आप स्वयं वहीं रुक जाता है ।

जिसके वचन दूसरों के लिए ज्ञान का प्रकाश करते हैं, पर उसके स्वयं के हृदय में मोह-राग है, जिसकी कोई थाह नहीं है, तो उसकी दशा उस मशालची की तरह है जो औरों को तो प्रकाशित करता है और स्वयं अंधकार में ही रहता है ।

जिसकी चर्चा सुनकर दूसरों के पाप नष्ट हो जाते हैं, परन्तु चर्चा करनेवाला अपना मैल नहीं धोता है । उसकी दशा उस दासी की-सी है जो औरों को मलमलकर नहलाती है और स्वयं अपनी सुधि नहीं रखती ।

उसका क्या इलाज किया जावे, क्या उपाय किया जावे, जो समुद्र की गहरी धारा में डूब रहा हो । बहुत जाप जपे, बहुत तप किए, पर उनसे एक भी कार्य सिद्ध नहीं हुआ ।

अरे ! तेरे स्वयं के भीतर यह चैतन्य आत्मा है वह ज्ञानवान है, उज्ज्वल है । द्यानतराय कहते हैं कि उसको जिसने देखा, वह सफल होकर भव- समुद्र के पार हो जाता है ।
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading