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श्री
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चेतन तोहि न नेक संभार
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राग : धनाश्री, सजनवा बैरी हो गए हमार

चेतन, तोहि न नेक संभार ।
नख सिख लों दिढबन्धन बैढे, कौन करे निरबार ॥टेक॥

जैसे आग पषान काठ में, लखिय न परत लगार ।
मदिरापान करत मतवारो, ताहि न कछू विचार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥१॥

ज्यों गजराज पखार आप तन, आपहि डारत छार ।
आपहि उगल पाट कौ कोरा, तनहिं लपेटत तार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥२॥

सहज कबूतर लोटन को सो, खुले न पेच अपार ।
और उपाय न बने 'बनारसि', सुमरन भजन अधार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥३॥



अर्थ : आत्मन्‌ ! तुम्हें तनिक भी विवेक नहीं है। तुम नख से लेकर शिखातक किस ग्रकार दृढ़ बन्धनसे वेष्टित हो, इसकी तुम्हें किंचित्‌ भी जानकारी नहीं है। आत्मन्‌ ! पता नहीं, इस अविवेकपूर्ण अवस्था में पड़े हुए तुम्हारा कैसे उद्धार होगा ? आत्मन्‌ ! तुम्हें तनिक भी विवेक नहीं है ।
आत्मन्‌ ! जिस प्रकार आग, पत्थर और काठ को जलान में कुछ भी विवेक नहीं करती तथा मदिरा पीनवाला भी उन्मत्त अवस्था में उचित-अनुचित एवं कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का तनिक भी विवेक नहीं रखता, उसी भाँति आत्मन्‌, अज्ञानावस्था में तुम्हारी प्रवृत्ति की दशा है । आत्मन्‌ ! तुम्हें तनिक भी विवेक नहीं है ।
आत्मन्‌ ! जिस प्रकार हाथी स्नान करने पर भी अपने शरीर पर घूल डाल लेता है। यह नहीं सोचता कि स्नान करन के बाद धूल डालने से स्नान करना निरर्थक हो जाता है और जिस प्रकार रेशम का कीड़ा तन्तुओं को उगलकर स्वयं उनके बन्धन में बंधता है, उसी प्रकार आत्मन्‌ ! तुम्हारी अविवेकमय प्रवृत्तियाँ ही तुम्हें बन्धन में डालती हैं । आत्मन्‌ ! तुम्हें तनिक भी विवेक नहीं है ।
आत्मन्‌ ! जिस प्रकार अदूरदर्शी कपोत विश्वाम करने के लिए पिजड़े के अन्दर चला जाता है और पुनः कीली बन्द होते ही उसमें से निकलना कठिन हो जाता है । उस समय उसके उद्धार का मार्ग केवल एक यही शेष रहता है कि वह भगवान्‌ के मांगलिक गुणों का स्मरण कर अपने अशुभ कर्मों को उपशान्त करे और इस प्रकार दुखद बन्धन से मुक्ति प्राप्त करे । उसी भांति आात्मन्‌ ! जब अपनी अविवेकपूर्ण प्रवृत्तियों से तुम कर्म-बन्धन से आबद्ध हो तब तुम्हारा उससे मुक्त होने का केवल एक ही उपाय है कि तुम निष्कलंक भगवान्‌ के गुणों का स्मरण और भजन करो और इस प्रकार बन्धन-मुक्त होकर शास्वत् सुख प्राप्त करो । आत्मन्‌ ! तुम्हें तनिक भी विवेक नहीं है ।
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