Jain Radio
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio
nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here

देव

शास्त्र

गुरु

धर्म

तीर्थ

कल्याणक

महामंत्र

अध्यात्म

पं दौलतराम कृत

पं भागचंद कृत

पं द्यानतराय कृत

पं सौभाग्यमल कृत

पं भूधरदास कृत

पं बुधजन कृत

पं मंगतराय कृत

पं न्यामतराय कृत

पं बनारसीदास कृत

पं ज्ञानानन्द कृत

पं नयनानन्द कृत

पं मख्खनलाल कृत

पं बुध महाचन्द्र

सहजानन्द वर्णी

पर्व

चौबीस तीर्थंकर

बाहुबली भगवान

बधाई

दस धर्म

बच्चों के भजन

मारवाड़ी

selected

प्रारम्भ

नित्य पूजा

तीर्थंकर

पर्व पूजन

विसर्जन

पाठ

छहढाला

स्तोत्र

ग्रंथ

आरती

द्रव्यानुयोग

चरणानुयोग

करणानुयोग

प्रथमानुयोग

न्याय

इतिहास

Notes

द्रव्यानुयोग

चरणानुयोग

करणानुयोग

प्रथमानुयोग

न्याय

इतिहास

Notes

द्रव्यानुयोग

चरणानुयोग

करणानुयोग

प्रथमानुयोग

न्याय

इतिहास

Notes

द्रव्यानुयोग

चरणानुयोग

करणानुयोग

प्रथमानुयोग

न्याय

इतिहास

Notes

Youtube -- शास्त्र गाथा

Youtube -- Animations

गुणस्थान

कर्म

बंध

प्रमाण

Other

Download

PDF शास्त्र

Jain Comics

Print Granth

Kids Games

Crossword Puzzle

Word Search

Exam

सरस्वती-वंदना
सरस्सदी-पसादेयण, कव्वं कुव्वंति माणवा ।
तम्हा णिच्चल-भावेण, पूयणीय सरस्सदी ॥१॥
अन्वयार्थ : सर्वज्ञ परमात्मा के श्रीमुख से समुत्पन्न जो 'भारती' (सरस्वती) है, वह अनेक भाषामय है । वह अज्ञानरूपी अंधकार का विनाश करती है तथा अनेक प्रकार की विद्याओं का बहुविध प्रकाशन करती है ।
सव्वण्हु-मुहुप्पण्णा, जा भारदी बहुभासिणी ।
अण्णाण-तिमिरं हंति, विज्जा-बहुविगासिणी ॥२॥
अन्वयार्थ : सर्वज्ञ परमात्मा के श्रीमुख से समुत्पन्न जो 'भारती' (सरस्वती) है, वह अनेक भाषामय है। वह अज्ञानरूपी अंधकार का विनाश करती है तथा अनेक प्रकार की विद्याओं का बहुविध प्रकाशन करती है।
सरस्दी मए दिठ्ठा, दिव्या कमललोयणा ।
हंसक्खधं - समारूढा, वीणा-पुत्थगधारिणी ॥३॥
अन्वयार्थ : सरस्वती मेरे द्वारा देखी गयी है, वह दिव्य आकृतिवाली एवं कमल-सदृश आँखोंवाली, हंस के स्कन्ध पर आरुढ़ तथा वीणा एवं पुस्तक को धारण किये हुये है ।

कमल निर्लिप्तता का प्रतीक
'हंस' नीर-क्षीरन्याय का प्रतीक,
'वीणा' यथावत् कथन का प्रतीक
'पुस्तक' ज्ञानानिधि का प्रतीक
पढमं भारदी णाम, विदियं च सरस्सदी ।
तदियं सारदादेवी, चदुत्थं हंसगामिणी ॥४॥
अन्वयार्थ : सरस्वती का प्रथम नाम भारती है, दूसरा नाम 'सरस्वती' है, तीसरा नाम 'शारदा देवी' है और चौथा नाम 'हंसगामिनी' है ।
पंचमं विदुसां मादा, छठ्ठं वागिस्सरी तहा ।
कुमारी सत्तमं उत्तं, अठ्ठमं बंभचारिणी ॥५॥
अन्वयार्थ : पाँचवाँ नाम 'विद्वन्माता' है, छठवाँ नाम 'वागीश्वरी' है, सातवाँ नाम 'कुमारी' है, और आठवाँ नाम ब्रह्मचारिणी' है ।
णवमं च जगम्मादा, दसमं बंभणी तहा ।
एगारसं च बंभाणी, बारसं वरदा हवे ॥६॥
अन्वयार्थ : नवमा नाम 'जगन्माता' है, दसवाँ नाम 'ब्रह्मणी', ग्यारहवाँ नाम 'ब्राह्मणी' है तथा बारहवाँ नाम 'वरदा' (वरदायिनी) है ।
वाणी या तेरसं णाम, भासा चेव चदुद्दसं ।
पंचदसां सुददेवी, सोलहं गो वि भण्णदे ॥७॥
अन्वयार्थ : उनका तेरहवाँ नाम 'वाणी' है, चौदहवाँ नाम 'भाषा' है, पन्द्रहवाँ नाम 'श्रुतदेवी' है तथा सोलहवाँ नाम 'गो' भी कहा जाता है ।
एदाणि सुद-णामाणि, पच्चूसे जो पढिज्जद ।
तस्स संतुट्ठदि मादा, सारदा वरदा हवे ॥८॥
अन्वयार्थ : इस श्रुत (सरस्वती) की नामवलि को 'प्रत्युष' काल में जो पढता है, उस पर माँ सरस्वती वरदायिनी होकर प्रसन्न होती हैं ।
सरस्सदि! णमो तुम्हं, वरदे कामरूविणी।
विज्जारंभं करिस्सामि, सिद्धी हवदु में सया ॥९॥
अन्वयार्थ : हे सरस्वती! तुम्हें नमस्कार है, तुम वर देने वाली एवं कामरूपिणी हो (में आपका स्मरण करके) विद्याध्यन आरम्भ करता हूँ मुझे सदा सिद्ध (ज्ञानाप्राप्ति) हो ।