इत्यादि वहिरंतर असाधरन, सुविभव निधान जी । इन्द्रादिविंद पदारविंद, अनिंद तुम भगवान जी ॥ मैं चिर दुखी पर १७चाहतैं, तुम धर्म नियत न उर धरो । परदेव सेव करी बहुत, नहिं काज एक तहाँ १८सरो ॥४॥
अब 'भागचन्द्र' उदय भयो, मैं शरन आयो तुम १९तने । इक दीजिये वरदान तुम जस, स्वपद दायक वुध भने ॥ परमाहिं इष्ट, अनिष्ट-मति-तजि, मगन निज गुन में रहों । दृगज्ञान-चर संपूर्ण पाऊं, भागचंद न पर चहों ॥५॥ ४कर्म-धूलि ५कमल की तरह ६प्रतिभासित होता है ७सुंदर ८पतिल (दुष्ट) ९अलग हो गये १०द्वेष, ११नष्ट करके १२खिरते हुए १३एकान्त सिद्धान्त को जलाने वाला स्याद्बाद १४शीघ्र १५बरसने से १६प्रसन्न होता है १७पर द्रव्यों की चाह से १८पूरा हुआ १९पास