तुमको कैसे सुख ह्वै मीत !
जिन विषयनि सँग बहु दुख पायो, तिनहीसों अति प्रीति ॥टेक॥
उद्यमवान बाग चलने को, तीरथ सों भयभीत ।
धरम कथा कथने को मूरख, चतुर मृषा-रस-रीत ॥
जिन विषयनि सँग बहु दुख पायो, तिनहीसों अति प्रीति ।
तुमको कैसे सुख ह्वै मीत ! ॥१॥
नाट विलोकन में बहु समझौ, रंच न दरस-प्रतीत्त ।
परमागम सुन ऊंघन लागौ, जागौ विकथा गीत ॥
जिन विषयनि सँग बहु दुख पायो, तिनहीसों अति प्रीति ।
तुमको कैसे सुख ह्वै मीत ! ॥२॥
खान पान सुन के मन हरषै, संजम सुन ह्वै ईत ।
'द्यानत' तापर चाहत होगे, शिवपद सुखित निचीत ॥
जिन विषयनि सँग बहु दुख पायो, तिनहीसों अति प्रीति ।
तुमको कैसे सुख ह्वै मीत ! ॥३॥
अर्थ : हे प्रिय! तुमको सुख कैसे हो सकता है। मिल सकता है? जिन इन्द्रिय-विषयों के कारण तुमको अत्यन्त दु:ख मिले हैं, उन्हीं के प्रति तुम्हारी प्रीति है, आकर्षण है !
बाग-बगीचों में सैर करने के लिए तो तुम परिश्रम करने को भी तैयार हो, परन्तु तीर्थयात्रा से तुम्हें भय लगने लगता है ! धर्मकथा कहने में तो तुम मूर्ख (अज्ञानी) बन जाते हो पर झूठे न मिथ्या कथा-कहानी-किस्से कहने में बहुत चतुर हो, उनमें रस लेते हो, रुचि प्रगट करते हो ?
नाटक (सिनेमा) आदि देखने में तो रुचि लेते हो, उनको बहुत अच्छी तरह समझते हो, पर भगवान की मुद्रा के दर्शन के प्रति कोई लगन नहीं रखते ! धर्म की / आगम की बात सुनकर ऊँघने लगते हो और विकथा सुनने के लिए पूर्ण जाग्रत हो जाते हो! खाने-पीने आदि की बातों में, भोजन-कथा आदि से मन हर्षित होता है ।
संयम की बात सुनकर कष्ट होता है ! द्यानतराय कहते हैं कि ऐसा करनेवाले इस पर भी इस बात की चाहना करते हैं कि उन्हें मोक्ष-सुख की प्राप्ति हो जाए और वे निश्चिन्त हो जाएँ !