जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ॥टेक॥
मोहमदवार पियौ, स्वपद विसार दियौ,
पर अपनाय लियौ, इन्द्रिसुख में रचियौ,
भवतैं न भियौ, न तजियौ मनमैलवा ॥
जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ॥१॥
मिथ्या ज्ञान आचरन धरिकर कुमरन,
तीन लोक की धरन, तामें कियो है फिरन
पायो न शरन, न लहायौ सुख शैलवा ॥
जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ॥२॥
अब नरभव पायौ, सुथल सुकुल आयौ,
जिन उपदेश भायौ, 'दौल' झट झिटकायौ,
परपरनति दुखदायिनी चुरेलवा ॥
जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ॥३॥
अर्थ : आत्मन्, तू अनादि काल से ही मोक्ष-मार्ग को भूला हुआ है ।
तूने मोह रूपी मदिरा पीकर आत्म-रूप को भूला दियाऔर पर-पद (परकीय परिणति) अपनाकर इन्द्रियों के सुखानुभव में तल्लीन हो गया। इस पर भी तू संसार से भयभीत नहीं हुआ और न ही तूने मन का मैल दूर करने का प्रयत्न किया ॥१॥
आत्मन्, तूने अपनी मिथ्या बृद्धि के कारण पर-पदार्थों में आत्मीयता मानी परन्तु यह पदार्थ अन्त-समय तेरा साथ न दे सके, उससे तुझे महान् संक्लेश हुआ ।
आत्मन्, इस बार तुझे मनृष्य-जन्म मिला और आत्म-कल्याण के अनुरूप तुझे उत्तम स्थान और उत्तम कुल का संयोग भी प्राप्त हुआ है । अब तो तुझे इस दुखद चुड़ैल (पर-परिणति) को अवश्य और शीघ्र ही छोड देना चाहिए ।