nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here

मानुषभव पानी दियो जिन
Karaoke :
राग विलावल

मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ।
पाए अनेक उपायकै, गयो नरक, निदाना ॥टेक॥

पुन्य उदय सम्पत मिली, फूल्या न समाना ।
पाप उदय जब खिर गई, हा! हा! बिललाना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥१॥

तीरथ बहुतेरे फिरे, अरचे पाषाना ।
राम कहूँ नहिं पाइयो, हूए हैराना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥२॥

राम मिलनके कारनैं, दीए बहु दाना ।
आठ पहर शुक ज्यों रटे, नहिं रूप पिछाना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥३॥

तलैं कहै ऊपर कहै, पावै न ठिकाना ।
देखै जाने कौन है, यह ज्ञान न आना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥४॥

वेद पढ़ै केई तप तपैं, कोई जाप जपाना ।
रैन दिना खोटी घडैं, चाहे कल्याना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥५॥

राम सबै घट-घट बसै, कहिं दूर न जाना ।
ज्यों चकमक में आग है, त्यों तन भगवाना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥६॥

तिनका ओट पहार है, जानै न अयाना ।
'द्यानत' निपट नजीक है, लख चेतनवाना ॥
मानुषभव पानी दियो, जिन राम न जाना ॥७॥



अर्थ : हे मानव! जिसने आत्मा को नहीं जाना, उसका यह मनुष्य भव पानी के समान ही बह गया, नष्ट हो गया । बहुत पाप करके नरक का निदान किया है अर्थात् उपार्जन किया है ।

यदि पुण्य उदय से कुछ संपदा मिल गई तो मानव फूलकर अपने में नहीं समाता और पाप-उदय होने पर विकल होकर बिलबिलाने लगता है ।

बहुत तीर्थ किए, बहुत पत्थरों को पूजा, पर राम कहीं न मिलते, यह सबसे बड़ी हैरानी है ।

राम से मिलने के लिए बहुत-सा दान किया। आठ पहर अर्थात् दिन-रात तोते की तरह उनका नाम रटता रहा, पर उसका स्वरूप नहीं पहचान सका ।

कोई कहे राम (आत्मा/भगवान) नीचे है, कोई कहे ऊपर है, पर उसका कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला । यह सब देखने-जाननेवाला कौन है ? वहीं तो आत्मा है, राम है यह समझ नहीं पाया ।

वेद आदि सांसारिक ग्रन्थ पढे, कई प्रकार के तप किए, जाप जपे-जपाए, रात-दिन कुचेष्टाएँ करता रहा और फिर भी अपना कल्याण चाह रहा है !

अरे, राम तो घट-घट में, हर प्राणिदेह में व्याप्त है, कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है । जैसे चकमक में आग उत्पन्न होने की योग्यता छिपी रहती है, ऐसे ही इस देह में भगवान छिपा है ।

आँख के आगे एक छोटे-से तिनके के आ जाने से, उसकी ओट में पहाड़ दिखाई नहीं देता है। उसी प्रकार द्यानतराय कहते हैं कि अपना चैतन्यस्वरूपी आत्मा तेरे अत्यन्त निकट है, तेरे अपने पास ही है फिर भी वह दिखाई नहीं देता, उसे ही लख-देख।
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading