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श्री
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अवधू सूतां क्या इस मठ
Karaoke :

अवधू, सूतां, क्या इस मठ में ॥टेक॥

इस मठ का है कबन भरोसा,
पड़ जावे चटपट में ॥अवधू...१॥

छिन में ताता, छिन में शीतल,
रोग-शोक बहु घट में ॥अवधू...२॥

पानी किनारे मठ का वासा,
कवन विश्वास ये तट में ॥अवधू...३॥

सूता सूता काल गमायो,
अजहुँ न जाग्यो तू घट में ॥अवधू...४॥

घरटी फेरी आटौ खायो,
खरची न बांची वट में ॥अवधू...५॥

इतनी सुनि निधिचारित मिलकर,
'ज्ञानानन्द' आये घट में ॥अवधू...६॥



अर्थ : हे अवधू (हंस, सन्यासी) ! तुम इस मठ में क्यो सो रहे हो ? इस शरीर के प्रति क्‍यों तुम इस प्रकार की आसक्ति बुद्धि बनाए हुए हो ? इस मठ का क्या विश्वास है? पता नही, किस क्षण बात-की-बात में यह धराशायी हो जाय । हे अवधू ! तुम इस मठ मे क्‍यों सो रहे हो ?
यह शरीर उष्ण की बाधा के कारण क्षणभर में गरम हो जाता है और शीत की बाधा के कारण क्षणभर में ठंडा पड जाता है । इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के रोग-शोक भी इस शरीर को व्याकुल किये रहते हैं । हे अवधू ! तुम इस मठ मे क्यों सो रहे हो ?
यह शरीर एक ऐसा मठ है, जो पानी के किनारे खडा हुआ है । जिस प्रकार पानी के किनारेवाले तट का कोई भरोसा नही होता है और किसी भी समय उसके खिसकन की सभावना से मठ के ढह जाने की भी पूर्ण आशंका बनी रहती है, उसी प्रकार इस शरीर का हाल है । उस मठ के समान यह शरीर भी आयुकर्म की समाप्ति के साथ कभी भी नष्ट हो सकता है। हे अवधूत ! तुम इस मठ में क्यों सो रहे हो ?
तुमने इस शरीर-मठ में सोते-सोते अनन्त काल बिता दिया - अब तक तुम इसे अपना मानकर इसके साथ गठबन्धन किये रहे - और अनन्त परिभ्रमण के कारण परिश्रान्त रहे । अरे ! तुमने अब भी अपनी आत्म-ज्योति को नही पहचाना ? अब भी आत्म-दर्शन करके शास्वत् कल्याण-मार्ग के पथिक बनों । हे अवधू ! तुम इस मठ में क्यों सो रहे हो ?
तुमने चक्की पीसकर आटा तो खा लिया अर्थात्‌ इस जीवन में तो तुमने जिस किस प्रकार अपना निर्वाह कर लिया, परन्तु यदि परलोक में सुख प्राप्त करन के लिए कुछ सुकृत नही कमाया तो वहाँ अनन्त यातनाओं के भोग के सिवाय और क्या मिलेगा ? हे अवधूत ! तुम इस मठ में क्यो सो रहे हो ?
कविवर की प्रस्तुत सबोचना सफल होती है और अबोध मानव अपने अनादिकालीन अज्ञानान्धकाराच्छन्न आत्मा में प्रबुद्ध होता है और अपने अनन्त ज्ञानानन्दमय स्वरूप में स्थिर रूप से प्रतिष्ठित रहने को ही अपना चरम लक्ष्य मान्य कर लेता है । वह अपने वर्तमान लक्ष्यहीन जीवन से विकल हो कह उठता है - हे अवधूत ! तुम इस मठ में क्‍यों सो रहे हो ?
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