मेरे मन कब ह्वै है बैराग ॥टेक॥
राज समाज अकाज विचारौं, छारौं विषय कारे नाग ॥१॥
मन्दिर वास उदास होय कैं, जाय बसौं बन बाग ॥२॥
कब यह आसा कांसा फूटै, लोभ भाव जाय भाग ॥३॥
आप समान सबै जिय जानौं, राग दोष कों त्याग ॥४॥
'द्यानत' यह विधि जब बनि आवै, सोई घड़ी बड़भाग ॥५॥
मेरे मन कब ह्वै है बैराग ॥
अर्थ : मेरे मन में कब विरक्तता होकर वैराग्य की भावना होगी?
राजकार्य, सामाजिक कार्य इन सबको निरर्थक जानकर इन्द्रिय-विषयरूप काले नागों से कब छुटकारा होगा ?
मन्दिर व घर से उदासीन होकर बन में, बगीचे में जाकर प्रकृति की गोद में कब निवास करूँगा?
कब आशा का पात्र नष्ट हो और हृदय से लोभ भी निकल जाए अर्थात् कामनाएँ - तृष्णा समाप्त हो ।
कब ऐसा होगा कि सभी जीवों को अपने समान जानूँ ! उनसे सभी प्रकार का राग-द्वेष का भाव त्यागूं ।
द्यानतराय कहते हैं कि जब इस प्रकार सब घटनाएँ घटित हों वह घड़ी ही अत्यन्त भाग्यशाली होगी।