चेतन यह बुधि कौन सयानी,
कही सुगुरु हित सीख न मानी ॥
कठिन काकताली ज्यों पायो,
नरभव सुकुल श्रवन जिनवानी ॥टेक॥
भूमि न होत चाँदनी की ज्यों,
त्याँ नहिं धनी ज्ञेय का ज्ञानी ।
वस्तुरूप यों तू यों ही शठ,
हटकर पकरत सोंज विरानी ॥
चेतन यह बुधि कौन सयानी ॥1॥
ज्ञानी होय अज्ञान राग-रुषकर,
निज सहज स्वच्छता हानी ।
इन्द्रिय जड़ तिन विषय अचेतन,
तहाँ अनिष्ट इष्टता ठानी ॥
चेतन यह बुधि कौन सयानी ॥2॥
चाहे सुख, दुःख ही अवगाहै,
अब सुनि विधि जो है सुखदानी ।
'दौल' आपकरि आप-आप मैं,
ध्याय ल्याय लय समरससानी ॥
चेतन यह बुधि कौन सयानी ॥3॥
अर्थ : हे चेतन! यह तेरी कौन सी चतुर बुद्धि है कि तू सदगुरू की हितकारी शिक्षा को स्वीकार नहीं करता ?
अरे, काकतालिय न्याय की भाँति संयोगवश अर्थात् बड़ी कठिनाई से तुझे यह मनुष्य भव, उत्तम कुल और जिनवाणी श्रवण का उत्तम अवसर मिला है अत: अब तो सद्गुरू की शिक्षा को स्वीकार कर ।
हे चेतन! जिस प्रकार चाँदनी में प्रकाशित होने वाली भूमि चाँदनी की नहीं होती, उसी प्रकार यह आत्मा ज्ञेय पदार्थों को जानता हुआ भी उनका स्वामी नहीं होता, यही वस्तु का स्वरूप है। किन्तु हे मूर्ख! तू व्यर्थ ही हठ करके पर परिणति व संयोगों को पकड़ता है।
हे चेतन! तू वास्तव में शुद्ध ज्ञनस्वभावी है, किन्तु अज्ञानमय राष-द्वेष करके तूने अपने सहज स्वभाव की स्वच्छता को नष्ट कर लिया है। इच्धियाँ तो जड़ हैं तथा उनके विषय भी अचेतन हैं, उनमें कोई भी इष्ट या अनिष्ट नहीं है, किन्तु तूने स्वयं ही उनमें इष्ट-अनिष्टपना मान रखा है।
हे चेतन! तू चाहता तो सुख है, किन्तु अनादि से दुःख ही पाता है, अत: अब सदगुरू द्वार बताये हुये इस सुखदायक उपाय को सुन एवं समझ। दौलतरामजी कहते है कि यदि यह आत्मा स्वयं, स्वयं के द्वारा और स्वयं में ही ध्यानपूर्वक लीन हो जाये तो समता रस के आनंद में निमग्न हो सकता है।