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श्री
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प्यारे काहे कूं ललचाय
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तर्ज : पल्लो लटके रे म्हारो

प्यारे, काहे कूं ललचाय ।
या दुनियाँ का देख तमासा, देखत ही सकुचाय ॥टेक॥

मेरी मेरी करत बाउरे, फिरे जीउ अकुलाय ।
पलक एक में बहुरि न देखे, जल बुंद की न्याय ॥
प्यारे, काहे कूं ललचाय ॥1॥

कोटि विकल्प व्याधि की वेदन, लही शुद्ध लपटाय ।
ज्ञान-कुसुम की सेज न पाई, रहे अघाय अघाय ॥
प्यारे, काहे कूं ललचाय ॥2॥

किया दौर चहुँ ओर जोर से, मृगतृष्णा चित लाय ।
प्यास बुझावन बूँद न पाई, यौं ही जनम गमाय ॥
प्यारे, काहे कूं ललचाय ॥3॥

सुधा-सरोवर है या घट में, जिसतें सब दुख जाय ।
'विनय' कहे गुरुदेव दिखावे, जो लाऊँ दिल ठाय ॥
च्यारे, काहे कूं ललचाय ॥4॥



अर्थ : प्रिय! तू किसलिए ललचाता है? संसारी प्राणियों की मनोवृत्ति देखकर मन में बड़ा संकोच होता है।
अरे मूर्ख ! तू 'मेरी-मेरी' करता है और अपनी आत्मा को आकुल करता हुआ भ्रमण करता है। जिस प्रकार जलबबूला देखते-देखते ही विलीन हो जाता है, उसी प्रकार हे मूर्ख! यह तेरा संग्रह भी क्षण भर में नष्ट हो जाता है । प्रिय! तू किसलिए ललचाता है?
आत्मन्‌! सांसारिक माया के करोड़ों विकल्प तुम्हारे शुद्ध स्वभाव को मलिन कर रहे हैं और तुम्हें अशान्त कर रहे हैं। तुम अब तक ज्ञान रूपी फूलों की शय्या नहीँ प्राप्त कर सके। यही कारण है कि तुम संसार की सीमातीत विभूति पाकर भी अतृप्त के अतृप्त ही दिखलाई दे रहे हो। प्रिय! तुम ललचाते क्‍यों हो?
आत्मन्‌! तुम मृगतृष्णा को भाँति तोब्र लालसा से प्रिय पदार्थों में सुख प्राप्त करने का पूरा प्रयत्न करते हो - अविराम दौड़ लगाते हो; परन्तु जिस प्रकार उस मृग को कोसों दूर दौड़ लगाने पर भी एक बूँद पानी नहीं मिलता, उसी प्रकार तुम्हें भी लेशमात्र सुख-शान्ति नहीं मिल पाती और यह दुर्लभ मानुष भव व्यर्थ ही चला जाता है। प्रिय! तुम किसलिए ललचाते हो?
आत्मन्‌! तुम्हारे अन्दर ही सुधा का सरोवर लहरा रहा है। उसे बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। इस सरोवर में स्नान करने से सब दुःख दूर हो जाते हैं और परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है। गुरुदेव भी इसी मार्ग की ओर संकेत कर रहे हैं । आवश्यकता है केवल मन को आत्मस्वरूप में स्थिर करने की । प्रिय! तुम किसलिए ललचाते हो?
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