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अब मोहि जानि परी
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अब मोहि जानि परी, भवोदधि तारन को हैं जैन ॥

मोह-तिमिर तें सदाकाल से, छाय रहे मेरे नैन ।
ताके नाशन काज लियो है, अंजन जैन सु ऐन ॥

मिथ्यामती भेष को लेकर, भासत हैं जो बैन ।
सो वे बैन असार लखैं हैं, ज्यों पानी के फैन ॥

मिथ्यामती बेल जग फैली, सो दुख-फल की दैन ।
सतगुरु भक्ति-कुठार हाथ ले, छेद लियो अति चैन ॥

जा बिन जीव अनादि काल तें, विधिवश सुखन लहै न ।
अशरन-शरन अभय 'दौलत' अब, भजो रैन-दिन जैन ॥



अर्थ : अहो, आज मुझे यह भलीभॉति ज्ञात हो गया है कि संसार-सागर से तारने के लिए एक जैनधर्म ही समर्थ है ।
अहो, अनादि-काल से मेरे नेत्र मोहरूपी अन्धकार से आच्छादित थे, किन्तु आज मैने उस मोहरूपी अन्धकार को नष्ट करने क॑ लिए जैनधर्म का श्रेष्ठ अंजन ग्रहण कर लिया है। संसार में अनेक मिथध्यादृष्टि जीव नाना भेष धारण करके बहुत बातें कहते हैं, किन्तु आज मैंने उनके वचनों को पानी के बुलबुलों की भाँति असार जान लिया है ।
संसार में मिथ्यादृष्टियों की बेल बहुत फैल रही है और वह दुःख़रूप फल को ही उत्पन्न करनेवाली है, किन्तु मैने तो सद्गुरु के उपासनारूपी कुठार को हाथ मे लेकर उसका नाश कर दिया है और परमसुख को प्राप्त कर लिया है ।
कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे भाई ! जिसके बिना जीव अनादिकाल से कर्मों के अधीन पड़ा है, सुख की प्राप्ति नहीं कर पाया है, जो अशरणों का शरण है और सबको भय-रहित करता है, उस जैनधर्म की दिन-रात उपासना करो ।