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श्री
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श्रीपार्श्वनाथ-पूजन
(गीता छन्द)
वर स्वर्ग प्राणत को विहाय, सुमात वामा सुत भये
अश्वसेन के पारस जिनेश्वर, चरन जिनके सुर नये ॥
नव हाथ उन्नत तन विराजै, उरग लच्छन पद लसैं
थापूं तुम्हें जिन आय तिष्ठो करम मेरे सब नसैं ॥
अन्वयार्थ : पार्श्वनाथ जिनेश्वर (भगवान्) [वर] श्रेष्ठ प्राणत स्वर्ग को [विहाय] छोड़कर माता वामा देवी और अश्वसेन के [सूत] पुत्र हुए । जिनके चरणों की वंदना [सुर] देवताओं ने करी थी । उनका [तन] शरीर नौ हाथ [उन्नत] ऊँचा [विराजै] सुशोभित था । उनके [पद] पैर में [उरग] सर्प का [लच्छन] चिन्ह [लसैं] सुशोभित था । हे जिनेन्द्र भगवान् में आपकी यहाँ स्थापना करता हूँ आप यहाँ आकर [तिष्ठो] विराजमान होइये (जिससे मैं आपकी पूजा करू और) मेरे सब कर्म नष्ट हो जायें ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि करणं

(चामर छन्द)
क्षीरसोम के समान अम्बुसार लाइये,
हेमपात्र धारि के सु आपको चढ़ाइये ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : [क्षीर] दूध के अथवा [सोम] चंद्रमा के समान सफ़ेद [सार] श्रेष्ठ [अम्बु] जल को [हेम] स्वर्ण [पात्र] कलश में [धारि] लेकर आपके समक्ष अर्पित करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा

चंदनादि केशरादि स्वच्छ गंध लीजिये,
आप चरण चर्च मोह-ताप को हनीजिये ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : मैं चंदन, केशर आदि सुगंधित वस्तुऎं लेकर आपके चरणो की पूजा करता हूँ, आप मोह (राग द्वेष) की [ताप] अग्नि को [हनीजिये] नष्ट कर दीजिए ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय भवताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा

फेन, चंद्र के समान अक्षतान् लाइके,
चर्न के समीप सार पुंज को रचाइके ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : दूध के [फेन] झाग या चंद्रमा के समान श्वेत स्वच्छ चावलों के श्रेष्ठ पुंजों को बनाकर । आपके [चर्न] चरणों के समीप हे पार्श्वनाथ भगवान्, मैं आपकी सदा सेवा करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा

केवड़ा गुलाब और केतकी चुनाइके,
धार चर्न के समीप काम को नशाइके ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : केवड़ा, गुलाब और केतकी के फूलों को चुन-चुन कर लाकर आपके चरणों के समीप, मेरे काम बाण को नष्ट करने के लिए रख रहा हूँ, आप उसे नष्ट कर दीजिये ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा

घेवरादि बावरादि मिष्ट सद्य में सने,
आप चर्न चर्चतें क्षुधादि रोग को हने ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : घेवर, बावर/ईमरती (मिठाई) आदि [सद्य] घी में [सने] बना कर [मिष्ट] चाशनी में डालकर आपके चरणों की पूजा करने से क्षुधा आदि रोग नष्ट हो जायेंगे ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा

लाय रत्न दीप को सनेह पूर के भरुं,
वातिका कपूर बारि मोह ध्वांत को हरुं ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : मोह रुपी [ध्वान्त] अन्धकार को क्षय करने के लिए,रत्न के दीपक को [सनेह पूर] घी से पूरा भरकर, कपूर की बत्ती से जला कर, आपके समक्ष अर्पित करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा

धूप गंध लेय के सुअग्निसंग जारिये,
तास धूप के सुसंग अष्टकर्म बारिये ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : सुगन्धित धुप लेकर अग्नि के साथ जलाता हूँ [तासु] उस धुप के संग अष्ट कर्मों को [बारिये] नष्ट करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा

खारिकादि चिरभटादि रत्न थाल में भरुं,
हर्ष धारिके जजूं सुमोक्ष सौख्य को वरुं ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : [खारिक] छुआरा आदि, [चिरभटा] ककड़ी आदि को रत्न के थाल में भरकर लाया हूँ । आपकी पूजा प्रफुल्लित होकर हर्षो-उल्लास पूर्वक मोक्ष सुख के वरण (प्राप्ति) के लिए करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा

नीर गंध अक्षतान पुष्प चारु लीजिये
दीप धूप श्रीफलादि अर्घ तैं जजीजिये ॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करुं सदा,
दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥
अन्वयार्थ : जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धुप और फल आदि का अर्घ बनाकर मैं आपकी [जजीजिये] पूजा करता हूँ ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(पंचकल्याणक अर्घ्यावली)
शुभप्राणत स्वर्ग विहाये, वामा माता उर आये
वैशाख तनी दुतकारी, हम पूजें विघ्न निवारी ॥
अन्वयार्थ : आप शुभ प्राणत स्वर्ग को [विहाय] छोड़कर वामा माता के [उर] पेट में वैशाख [कारी] कृष्ण [दुति] द्वितिया को आये थे । हम विघ्नों के निवारण के लिए आप (भगवान् पार्श्वनाथ जी) की पूजा करते हैं ।
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णाद्वितीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

जनमे त्रिभुवन सुखदाता, एकादशि पौष विख्याता
श्यामा तन अद्भुत राजै, रवि कोटिक तेज सु लाजै ॥
अन्वयार्थ : तीनों लोक के सुख-दाता, त्रिलोक-नाथ का जन्म प्रसिद्द पौष कृष्ण एकादशि को हुआ था । आपका काले वर्ण का शरीर अत्यंत सुशोभित हो रहा था, उसका प्रकाश करोड़ों सूर्य के प्रकाश को भी लज्जित कर रहा था ।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णा एकादश्यांजन्ममंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

कलि पौष एकादशि आई, तब बारह भावन भाई
अपने कर लौंच सु कीना, हम पूजैं चरन जजीना ॥
अन्वयार्थ : पौष कृष्ण एकादशि को आपने १२ भावनाओं को भाया । अपने हाथों से केश-लौंच कर दिक्षा धारण करी, हम आपके पूज्य चरणों की [जजीना] अर्चना करते हैं ।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णा एकादश्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

कलि चैत चतुर्थी आई, प्रभु केवल ज्ञान उपाई
तब प्रभु उपदेश जु कीना, भवि जीवन को सुख दीना ॥
अन्वयार्थ : चैत कृष्ण चतुर्थी को भगवान् को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ । तब भगवान् ने उपदेश दिया जिससे भव्य जीवों को सुख की प्राप्ति हुई ।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाचतुर्थ्यां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

सित सातैं सावन आई, शिवनारि वरी जिनराई
सम्मेदाचल हरि माना, हम पूजैं मोक्ष कल्याना ॥
अन्वयार्थ : श्रावण [सित] शुक्ल सप्तमी को मोक्ष रुपी लक्ष्मी/स्त्री का वरण किया अर्थात मोक्ष प्राप्त किया । [हरि] इंद्र ने सम्मेद शिखर जी पर आकर आपके मोक्ष स्थल पर वज्र की [सूची] कलम से [माना] आपके चरण अंकित किये । हम आपके मोक्ष कल्याणक की पूजा करते हैं ।
ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लासप्तम्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

(जयमाला)
(छन्द मत्तगयन्द)
पारसनाथ जिनेंद्रतने वच, पौन भखी जरते सुन पाये
कर्यो सरधान लह्यो पद आन भये पद्मावति शेष कहाये
नाम प्रताप टरैं संताप, सुभव्यन को शिवशर्म दिखाये
हे अश्वसेन के नंद भले, गुण गावत हैं तुमरे हर्षाये ॥
अन्वयार्थ : [जरते] जलते हुए [पौनभखी] (हवा खाने वाले) सर्प/सर्पिणी ने पारसनाथ जिनेंद्र [तने] के, वचन सुनकर उन पर श्रद्धां करने से पद्मावती और धरणेन्द्र में जन्म लिया । उनके नाम के प्रताप से दुःख दूर हो जाते हैं, भव्य जीवों को [शर्म] मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है । हे अश्वसेन के पुत्र हम आपके गुणों का गान हर्षपूर्वक करते हैं ।
(दोहा)
केकी-कंठ समान छवि, वपु उतंग नव हाथ
लक्षण उरग निहार पग, वंदौं पारसनाथ
अन्वयार्थ : पार्श्वनाथ भगवान् की छवि अर्थात वर्ण [केकी] मोर के [कंठ] गले के समान नीला/काला, [वपु] शरीर की [तंग] ऊंचाई [नव] नौ हाथ थी,मैं उनके चरणों में [उरग] सर्प का चिन्ह देखकर उनकी पूजा करता हूँ ।
(मोतियादाम छन्द)
रची नगरी छह मास अगार, बने चहुं गोपुर शोभ अपार
सु कोट तनी रचना छबि देत, कंगूरन पें लहकें बहुकेत
अन्वयार्थ : भगवान् के गर्भ में आने से छह माह [अगार] पूर्व नगरी बनाई जो कि चारों दिशाओं में [गोपुर] मुख्य द्वारों से अत्यंत सुशोभित थी । उसके चारो ओर बहुत सुंदर [कोट] बाउंड्री बनायी थी।ऊपर [कंगूरन पें लहकें बहुकेत] बहुत सारी झुमरिया [लहकें] लहरा रही थी ।
बनारस की रचना जु अपार, करी बहु भांति धनेश तैयार
तहां अश्वसेन नरेन्द्र उदार, करैं सुख वाम सु दे पटनार
अन्वयार्थ : विविध प्रकार से कुबेर ने अत्यंत सुन्दर बनारस नगरी बनाई थी । वहाँ अत्यंत उदार राजा अश्वसेन अपनी पटरानी वामा देवी के साथ सुखों से भरपूर जीवन आनंद पूर्वक व्यतीत कर रहे थे ।
तज्यो तुम प्रानत नाम विमान, भये तिनके वर नंदन आन
तबै सुर इंद्र नियोगनि आय, गिरिंद करी विधि न्हौन सुजाय
अन्वयार्थ : हे भगवान् आप प्राणत स्वर्ग को [तज्यो] त्याग कर उनके(माता वामा देवी और अश्वसेन राजा) [वर नंदन] श्रेष्ठ पुत्र हुए।तभी देव और इंद्र [नियोगनि] नियोग पूजा करने के लिए आये और उनको (जिनेन्द्र भगवान् बालक) [गिरिंद] समेरू पर्वत पर ले जाकर नहलाया / उनका जन्माभिषेक किया ।
पिता-घर सौंपि गये निजधाम, कुबेर करै वसु जाम सुकाम
बढ़े जिन दोज-मयंक समान, रमैं बहु बालक निर्जर आन
अन्वयार्थ : [निर्जर] बालक तीर्थंकर को उनके पिता के घर छोड़कर वे अपने घर चले गए । कुबेर उनकी [वसु] आठो [जाम] पहर सेवा करते थे । वे दूज के [मयंक] चंद्रमा के समान बढ़ने लगे। बहुत से देवों ने बालक बनकर बालक तीर्थंकर के साथ क्रीड़ा कर उनके साथ रमे रहे ।
भए जब अष्टम वर्ष कुमार, धरे अणुव्रत महा सुखकार
पिता जब आन करी अरदास, करो तुम ब्याह वरो ममआस
अन्वयार्थ : जब पार्श्वनाथ कुमार आठ वर्ष के हुए तब उन्होंने महान सुखदायक अणुव्रतों को धारण किया । पिताजी ने अपनी आशा की पूर्ती करने के लिए उनसे विवाह का [अरदास] निवेदन किया ।
करी तब नाहिं रहे जग चंद, किये तुम काम कषाय जुमंद
चढ़े गजराज कुमारन संग, सुदेखत गंगतनी सुतरंग
अन्वयार्थ : पिता के निवेदन पर पार्श्वनाथ ने विवाह के लिए मना कर संसार में चंद्रमा के समान सुशोभित रहते हुए काम और कषायों को अधिक मंद किया । हाथी पर चढ़कर अन्य कुमारों के साथ जाते हुए गंगा नदी की तरंगों को देख कर आनंदित हो रहे थे ।
लख्यो इक रंक कहै तप घोर, चहूंदिशि अगनि बलै अति जोर
कहै जिननाथ अरे सुन भ्रात, करै बहु जीवन की मत घात
अन्वयार्थ : उन्होंने एक [रंक] सन्यासी को चारो तरफ लकड़ी [बलै] जलाकर घोर तप करते हुए [लख्यो] देखा । जिनेन्द्र भगवान् ने कहा कि हे भाई सुनो इन्हे जलाकर तुम जीवों का घात मत करो । (तुम्हारे लकड़ी जलाने से सर्प और सर्पिणी का युगल जिन्दा जल रहा है, यह उन्होंने अवधि ज्ञान से जान लिया था)
भयो तब कोप कहै कित जीव, जले तब नाग दिखाय सजीव
लख्यो यह कारण भावन भाय, नये दिव ब्रह्मरिषीसुर आय
अन्वयार्थ : तब वह सन्यासी [कोप] क्रोधित होकर कहने लगा जीव कहाँ है । तब उन्होंने उसे जलते हुए जीवित सर्प को दिखाया । यह देखकर वे १२ भावनाओं को भाने लगे और उन्हें वैराग्य वृद्धि हुई, [ब्रह्मरिषीसुर] लौकांतिक देव ने आकर उन्हें नमस्कार कर के वैराग्य की अनुमोदना करी ।
तबहिं सुर चार प्रकार नियोग, धरी शिविका निज कंध मनोग
कियो वन माहिं निवास जिनंद, धरे व्रत चारित आनन्दकंद
अन्वयार्थ : तभी चारों प्रकार के देवों ने अपने नियोग के अनुसार [मनोग] सुंदर [शिविका] पालकी को अपने कंधो पर रख कर ले गए। वन में जिनेन्द्र भगवान् ने रह कर आनंद के समूह को प्रदान करने वाले व्रत और चरित्र अर्थात निर्ग्रथ मुनि दीक्षा धारण करी ।
गहे तहँ अष्टम के उपवास, गये धनदत्त तने जु अवास
दियो पयदान महासुखकार, भई पन वृष्टि तहां तिहिं बार
अन्वयार्थ : उपवास के बाद धनदत्त सेठ के घर गये जहाँ उन्होंने भगवान् को महा सुखकारी पयदान / आहार दान दिया जिस के फलस्वरूप उनके आंगन में तीन बार देवों ने रत्नों की वृष्टि करी ।
गये तब कानन माहिं दयाल, धर्यो तुम योग सबहिं अघ टाल
तबै वह धूम सुकेतु अयान, भयो कमठाचर को सुर आन
अन्वयार्थ : आपने [कानन] वन में जाकर समस्त [अघ] पापों को दूर कर योग धारण किया । तब वह सन्यासी कमठ का जीव अचानक आया ।
करै नभ गौन लखे तुम धीर, जु पूरब बैर विचार गहीर
कियो उपसर्ग भयानक घोर, चली बहु तीक्षण पवन झकोर
अन्वयार्थ : वह आकाश में गमन कर रहा था उसने आपको देखा और पूर्व बैर को विचार करके भयानक उपसर्ग कर, घोर आंधी चलायी, तीक्ष्ण हवा चलायी ।
रह्यो दशहूं दिश में तम छाय, लगी बहु अग्नि लखी नहिं जाय
सुरुण्डन के बिन मुण्ड दिखाय, पड़ै जल मूसलधार अथाय
अन्वयार्थ : जिससे दसों दिशाओं में अन्धकार हो गया, चारों ओर उसने अग्नि लगाई, [सुरुण्डन] धड़ के बिना [मुंड] सिर दिखाए और मूसलाधार जल की वर्षा करी ।
तबै पद्मावति-कंत धनिंद, नये जुग आय जहां जिनचंद
भग्यो तब रंक सुदेखत हाल, लह्यो तब केवलज्ञान विशाल
अन्वयार्थ : तब पद्मावति और उनके [कन्ठ] पति धरणेन्द्र दोनों ने आकर [नये] नमस्कार किया, तब वह रंक-कमठ का जीव वहाँ से भाग गया और भगवान् को केवल ज्ञान हुआ ।
दियो उपदेश महा हितकार, सुभव्यन बोध समेद पधार
सुवर्णभद्र जहाँ कूट प्रसिद्ध, वरी शिवनारि लही वसुरिद्ध
अन्वयार्थ : भगवान् ने दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को बोध कर सम्मेद शिखर जी पहुंच कर वहां की प्रसिद्द सुवर्ण-भद्र कूट से मोक्ष-लक्ष्मी का वरण किया अर्थात मोक्ष पधारे ।
जजूं तुम चरन दोउ कर जोर, प्रभू लखिये अबही मम ओर
कहै 'बखतावर' रत्न बनाय, जिनेश हमें भव पार लगाय
अन्वयार्थ : मैं आपके दोनों चरणों की हाथ जोड़कर वंदना करता हूँ प्रभु अब मेरी ओर देखिये । बख्तावर कवि कहते है जिनेन्द्र भगवान् हमको पार लगा दीजिये ।
(धत्ता)
जय पारस देवं, सुरकृत सेवं, वंदत चर्न सुनागपती
करुणा के धारी पर उपकारी, शिवसुखकारी कर्महती ॥
अन्वयार्थ : पार्श्वनाथ भगवान् की जय हो । देवों के द्वारा जिनकी वंदना करी जाती है, हम उन चरणों की वंदना करते हैं, वे करुणा धारी हैं, अन्य जीवों का उपकार करने वाले हैं, मोक्ष सुख को प्रदान करने वाले और कर्मों को नष्ट करने वाले हैं ।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

जो पूजै मन लाय भव्य पारस प्रभु नितही
ताके दुख सब जाय भीति व्यापै नहि कित ही ॥
सुख संपति अधिकाय पुत्र मित्रादिक सारे
अनुक्रमसों शिव लहै, 'रत्न' इमि कहै पुकारे ॥
(इत्याशिर्वादः ॥ पुष्पांजलिं क्षिपेत ॥)
अन्वयार्थ : जो भव्य नित्य मन लगाकर पार्श्वनाथ भगवान् को पूजते है उसके सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और उसे किसी भी प्रकार का डर नहीं सताता । उसके सुख, सम्पत्ति, पुत्र, मित्र खूब होते है । और क्रम से वह मोक्ष को प्राप्त करता है ।
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