सुन सुन चेतन! लाड़ले, यह चतुराई कौन हो ॥टेक॥
आतम हित तुम परिहर्यो, करत विषय-चिंतौन हो ॥
गहरी नीव खुदाइकै हो, मकां किया मजबूत ।
एक घरी रहि ना सकै हो, जब आवै जमदूत हो ॥१॥
स्वारथ सब जगवल्लहा हो, विनु स्वारथ नहिं कोय ।
बच्छा त्यागै गायको रे, दूध बिना जो होय ॥२॥
और फिकर सब छांडि दे हो, दो अक्षर लिख लेह ।
'द्यानत' भज भगवन्त को हो, अर भूखे को देह हो ॥३॥
अर्थ : हे चेतन! सुनो, यह कैसी चतुराई है ! तुमने अपनी आत्मा के हित का विचार छोड़ दिया है और इन्द्रिय-विषयों की चिन्ता करते हो ?
गहरी नींव खुदा करके तो तुमने अपने भवन के आधार का, मजबूती का ध्यान रखा । पर यह नहीं सोचा कि जब यमदूत आएँगे तो तुम एक घड़ी भी उसमें नहीं रह सकोगे, रुक नहीं सकोगे ।
जगत में सबको स्वार्थ ही प्रिय है, स्वार्थ के कारण वस्तु प्रिय लगती है । बिना स्वार्थ के कोई अच्छा नहीं लगता । बछड़ा भी उस गाय को छोड़ देता है जिसके स्तनों में दूध शेष न रहा हो ।
द्यानतराय कहते हैं, अरे तू सारी चिन्ता-फिक्र छोड़कर (सोहं) ये दो अक्षर मन में लिख ले और भगवान का भजन कर ले । यह उतना ही आवश्यक है कि जैसे देह को भूख लगती है ।