nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here
श्री-गोम्टेश्वर-स्तुति
विसट्ट कंदोट्ट दलाणुयारं, सुलोयणं चंद समाण तुण्डं
घोणाजियं चम्पय पुप्फसोहं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥१॥
अन्वयार्थ : [सुलोयणं] जिनके उत्तम नेत्र [कंदोट्ट] नील कमल के [दलाणुयारं] पत्र (पंखुड़ी) के अनुशरण को [विसट्ट] छोड़ने वाले अर्थात उससे भी सुन्दर हैं, [तुण्डं] मुख [चंद-समाण] चन्द्रमा के समान सौम्य तथा [घोणा] नासिका [चम्पय पुप्फसोहं] चम्पक पुष्प की शोभा को [जियं] जीतती है (पराजित करती है), [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥१॥
अच्छाय-सच्छं जलकंत गंडं, आबाहु दोलंत सुकण्ण पासं
गइंद-सुण्डुज्जल बाहुदण्डं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥२॥
अन्वयार्थ : [जलकंत गंडं] जल के समान स्वच्छ कपोल [सुकण्ण पासं] कर्णपाश [आबाहु दोलंत] कंधो तक दोलयित हैं, [बाहुदण्डं] दोनों भुजाएँ [गइंद-सुण्डुज्जल] गजराज की सूंड के समान सुन्दर लम्बी हैं, [तं] उन [अच्छाय-सच्छं] आकाश के समान निर्मल [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥२॥
सुकण्ठ-सोहा जियदिव्व संखं, हिमालयुद्दाम विसाल कंधं
सुपेक्ख णिज्जायल सुट्ठुमज्झं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥३॥
अन्वयार्थ : [सुकण्ठ-सोहा] अद्वितीय कंठ की शोभा से जिन्होंने [दिव्व संखं] दिव्य (अनुपम) शंख की शोभा को [जिय] जीत लिया है, [यस्य कंधं] जिनका वक्ष स्थल [हिमालयुद्दाम] हिमालय की भाँति उन्नत [च] और [विसाल] विशाल है, [यस्य] जिनका [सुट्ठुमज्झं] सुन्दर मध्यभाग/ कटिप्रदेश [सुपेक्ख णिज्जायल] सम्यक् अवलोकनीय और अचल है, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥३॥
विज्झाय लग्गे पविभासमाणं, सिहामणि सव्व-सुचेदियाणं
तिलोय-संतोसय-पुण्णचंदं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥४॥
अन्वयार्थ : [विज्झाय लग्गे] विंध्यगिरी के अग्रभाग में [पविभासमाणं] जो प्रकाशमान हो रहे हैं, [सव्व-सुचेदियाणं] सभी सुन्दर चैत्यों के [सिहामणि] शिखामणि तथा [तिलोय-संतोसय] तीन लोक के जीवों को आनंद देने में [पुण्णचंदं] जो पूर्ण चन्द्रमा हैं, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥४॥
लया-समक्कंत-महासरीरं, भव्वावलीलद्ध सुकप्परुक्खं
देविंदविंदच्चिय पायपोम्मं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥५॥
अन्वयार्थ : [लया-समक्कंत] लताओं से आक्रांत (जिनका) [महासरीरं] विशाल शरीर है, [भव्वावलीलद्ध] जो भव्य समूह के लिए प्राप्त [सुकप्परुक्खं] कल्पवृक्ष के समान है तथा [देविंदविंदच्चिय] देवेंद्रों के द्वारा अर्चित जिनके [पायपोम्मं] पाद-पद्म (चरण कमल) हैं, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥५॥
दियंबरो जो ण भीइ जुत्तो, ण चांबरे सत्तमणो विसुद्धो
सप्पादि जंतुप्फुसदो ण कंपो, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥६॥
अन्वयार्थ : [दियंबरो जो] जो दिगंबर हैं, [च] और [ण भीइ जुत्तो] भययुक्त नहीं हैं अर्थात निर्भय हैं, [ण च अंबरे] और न वस्त्रादि में [सत्तमणो] आसक्त मन वाले हैं [विसुद्धो] विशुद्ध हैं, [सप्पादि जंतुप्फुसदो] सर्पादि जंतुओं से स्पर्श होने पर भी [ण कंपो] कम्पायमान नहीं हैं अर्थात अडोल-अकम्प हैं, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥६॥
आसां ण जो पोक्खदि सच्छदिट्ठी, सोक्खे ण वंछा हयदोसमूलं
विराय भावं भरहे विसल्लं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥७॥
अन्वयार्थ : [जो सच्छदिट्ठी] जो स्वच्छ (सम) दृष्टि होने से [आसां] आशा तृष्णा को [ण पोक्खदि] पुष्ट नहीं करते [हयदोसमूलं] दोषों का मूल (मोह) नाश करने में [सोक्खे] जिनकी सुख में [ण वंछा] वांछा नहीं और [विराय भावं] विराग भाव होने से [भरहे] भरत में [विसल्लं] जो निशल्य हैं, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥७॥
उपाहि मुत्तं धण-धाम-वज्जियं, सुसम्मजुत्तं मय-मोह-हारयं
वस्सेय पज्जंतमुववास-जुत्तं, तं गोम्मटेसं पणमामि णिच्चं ॥८॥
अन्वयार्थ : [उपाहि मुत्तं] जो उपाधि से रहित हैं, [धण-धाम] धन मकान आदि से [वज्जियं] रहित हैं, [सुसम्मजुत्तं] समता भाव सहित हैं तथा [मय-मोह-हारयं] मद मोह को हरने (नष्ट करने) वाले हैं, [वस्सेय पज्जंतं] एक वर्ष पर्यन्त [उववास-जुत्तं] उपवास धारण करने वाले, [तं] उन [गोम्मटेसं] गोम्मट स्वामी को [णिच्चं] (मैं) नित्य [पणमामि] प्रणाम करता हूँ ॥८॥
Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading