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जय जग भरम तिमिर हरन
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जय जय जग-भरम-तिमिर हरन जिनधुनी ॥

या बिन समझे अजों न सोंज निज मुनी ।
यह लखि हम निज-पर-अविवेकता लुनी ॥

जाको गनराज अंग-पूर्वमय चुनी ।
सो कही है कुन्दकुन्द प्रमुख बहु मुनी ॥

जे चर जड़ भये पीय मोह-बारुनी ।
तत्त्व पाय चेते जिन थिर सुचित सुनी ॥

कर्ममल पखारनेहि विमल सुरधुनी ।
तज विलम्ब अम्ब करो दौल! उर पुनी ॥



अर्थ : हे जगत के भ्रमरूपी अन्धकार को दूर करनेवाली जिनेन्द्र-ध्वनि ! तुम्हारी बारम्बार जय हो।
अनीद काल से आज तक इस जीव ने तुमको समझे बिना ही अपने सच्चे स्वरूप को नहीं पहचाना है और ज्ञानी जीवों ने तुमको समझकर ही स्व-पर सम्बन्धी अज्ञान को नष्ट कर दिया है ।
इसी जिनवाणी को गणधर देवों ने अंग-पूर्वमय चुनकर प्रतिपादित किया है और कुन्दकुन्द आदि अनेक प्रमुख आचार्यो ने भी इसी जिनवाणी का कथन किया है।
जो जीव मोहरूपी शराब पीकर अचेतन-से हो रहे हैं, उनमें से जिन जीवों ने इस जिनवाणी की स्थिर चित्त होकर सुना है, वे तत्त्व की प्राप्ति करके जागृत हों गये हैं।
कर्मरूपी मैल को धोने के लिए यह जिनवाणी पवित्र गंगा नदी के समान है। कविवर दौलतराम कहते है कि हे माँ ! अब देर न करो, मेरा हृदय पवित्र करो ।