चेतन तोसौं आज होरी खेलौंगी रे ॥टेक॥
अनँत दिवस क्यौं अनतहि डोल्यौ, ताकौ बदला अब ल्यौंगी रे ॥1॥
जो तैं करी सो भंडुवा गवाऊं, संजमतैं कर बाँधौगी रे ।
त्रास परीषह लगैगी तेरै, तब सुधताई आवैगी रे ॥2॥
जिन तोकौं दुख दै भरमायौ, ता दुरमतिकौं भगावौंगी रे ।
खोटे भेष धरे लंगर तैं, अब शुभ भेष बना द्यौंगी रे ॥3॥
समकित दरस गुलाल लगाऊ, ज्ञान सुधारस छिरकौंगी रे ।
चारित चोबा चरचौं सब तन, दया मिठाई खबावौंगी रे ॥4॥
'बुधजन' यौ तन सफल करौंगी, विधि-विपदा सब चूरौंगी रे ।
हिलमिल रहुँ बिछुरौं नहिं कबहूं, मन की आशा पूरौंगी रे ॥5॥
अर्थ : हे चेतन! आज मैं तुझसे होली खेलूंगी । तू अनन्त काल से अन्यत्र ही डोलता रहा है, अब उसका बदला लूंगी। तूने बहुत उपद्रव किये हैं, पर अब संयम से तेरे हाथ बाँधूगी । तुझे दुःख लगेंगे, तभी तुझे सुध आएगी। जिसने तुझे दुःख देकर भटकाया है, उस दुर्मति को दूर भगाऊँगी। तूने खोटे वेश धारण किए हैं, परन्तु अब मैं तेरा शुभ रूप बना दूंगी। सम्यग्दर्शन रूपी गुलाल लगाऊँगी, ज्ञाने रूप अमृत रस छिड़कूँगी, चारित्र रूपी चोबा शरीर पर मलूंगी और दया रूपी मिठाई खिलाऊँगी।
बुधजन कवि कहते हैं कि यह तन सफल करके कर्म रूपी दुःखों को नष्ट करूंगी। हम हिलमिल कर रहें, कभी नहीं बिछुड़ें ऐसी मन की आशा पूर्ण करूँगी ।