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श्री
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अब मेरे समकित सावन
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राग : मल्हार; तर्ज : आज मैं परम पदारथ

अब मेरे समकित सावन आयो ॥टेक॥
बीति कुरीति मिथ्या मति ग्रीषम, पावस सहज सुहायो ॥

अनुभव दामिनि दमकन लागी, सुरति घटा घन छायो
बोलै विमल विवेक पपीहा, सुमति सुहागिनि भायो ॥
अब मेरे समकित सावन आयो ॥१॥

गुरुधुनि गरज सुनत सुख उपजै, मोर सुमन विहसायो
साधक भाव अंकूर उठे बहु, जित तित हरष सवायो ॥
अब मेरे समकित सावन आयो ॥२॥

भूल धूल कहिं भूल न सूझत, समरस जल झर लायो
'भूधर' को निकसै अब बाहिर, निज निरचू घर पायो ॥
अब मेरे समकित सावन आयो ॥३॥



अर्थ : अब मेरे जीवन में सम्यक्त्वरूपी श्रावण मास आ गया है । धार्मिक कुरीति मिथ्यामतिरूपी ग्रीष्म ऋतु बीत गई है और सहज सुख-शान्तिदायक सम्यक्त्व सुरीतिरूप वर्षा ऋतु आ गई है।

आत्मा के अनुभवरूप बिजली चमकले लगी है, आत्म-स्मृतिरूप मेघों की घनीभूत घटा छा गई है, निर्मल विवेक रूपी पपीहा बोलने लगा है और सुमति रूपी सुहागिन (सौभाग्यवती नारी), प्रसन्न हो गई है; इसप्रकार अब मेरे जीवन में सम्यक्त्वरूपी श्रावणमास आ गया है।

जिसप्रकार मेघों की गर्जना सुनकर मयूर प्रमुदित हो उठते हैं, नाचने लगते हैं; उसीप्रकार सद्गुरु की गर्जना सुनकर मेरा मन रूपी मोर प्रसन्न हो उठा है, आनन्दित हो उठा है और उसमें साधकभाव के बहुत से अंकुर फूट पड़े हैं तथा यत्र-तत्र सर्वत्र हर्ष छा गया है। इसप्रकार अब मेरे जीवन में सम्यक्त्वरूपी श्रावण मास आ गया है।

प्रयोजनभूत तत्त्वों सम्बन्धी भूलरूपी धूल मूल से समाप्त हो गई है, अत: कहीं भी दिखाई नहीं देती तथा समतारूपी जल सर्वत्र ही भर गया है; जीवन में समता आ गई है। कविवर भूधरदासजी कहते हैं कि जब मैंने इसप्रकार का निरचू (जिसमें पानी नहीं रिसता) घर प्राप्त कर लिया है तो अब मैं इस निरचू घर से बाहर क्यों निकलूँ? अब तो मैं सदा इस निरचू घर में ही रहूँगा; क्योंकि अब मेरे जीवन में सम्यक्त्वरूपी सावन आ गया है ।
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