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श्री
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भाई कौन कहै घर मेरा
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राग : आसावरी जोगिया, मोहे भूल गए साँवरिया

भाई कौन कहै घर मेरा...
जे जे अपना, मान रहे थे, तिन सबने निरवेरा ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...

प्रात समय नृप मन्दिर ऊपर, नाना शोभा देखी ।
पहर चढ़े दिन काल चालतैं, ताकी धूल न पेखी ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥१॥

राज कलश अभिषेक लच्छमा, पहर चढ़ें दिन पाई ।
भई दुपहर चिता तिस चलती, मीतों ठोक जलाई ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥२॥

पहर तीसरे नाचैं गावै, दान बहुत जन दीजे ।
सांझ भई सब रोवन लागे, हाहाकार करीजे ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥३॥

जो प्यारी नारी को चाहै, नारी नर को चाहै ।
वे नर और किसी को चाहैं, कामानल तन दाहै ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥४॥

जो प्रीतम लखि पुत्र निहोरै, सो निज सुत को लोरै ।
सो सुत निज सुतसों हित जोरै, आवत कहत न ओरै ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥५॥

कोड़ाकोड़ि दरब जो पाया, सागरसीम दुहाई ।
राज किया मन अब जम आवै, विषकी खिचड़ी खाई ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥६॥

तू नित पोखै वह नित सोखै, तू हारै वह जीते ।
'द्यानत' जु कछु भजन बन आवै, सोई तेरो मीतै ॥
भाई कौन कहै घर मेरा...॥७॥



अर्थ : अरे भाई ! कौन कहता है कह सकता है कि यह घर मेरा है ! जो-जो इसको अपना मान रहे थे उन सभी ने इसको छोड़ दिया है । सुबह के समय राजा ने मन्दिर / महल के ऊपर कई प्रकार के शोभारूप देखे, पर एक पहर दिन चढ़ने पर उसकी धूल भी नहीं देख पाये ।

एक पहर दिन चढ़ने पर राज्याभिषेक हुआ, लक्ष्मी की प्राप्ति हुई। दोपहर बीतते-बीतते उसको चिता जलने लगी और मित्रगण उसके ठोके देकर जलाने लगे ।

कभी कहीं तीसरे प्रहर कोई शुभ कार्य हुआ तो खूब नाच-गान हुए, बहुत सा दान दिया गया और साँझ के समय फिर कोई अशुभ घटना हो गई और फिर सब रोने लगे, हाहाकार हो गया ।

कोई पुरुष अपनी स्त्री को बहुत चाहता है और स्त्री पुरुष को चाहती है, तो वह ही पुरुष काम के वशीभूत होकर उसमें जलता हुआ फिर दूसरी स्त्री को चाहने लगता है ।

प्रियतम को देखकर पुत्र से अनुगृहीत होती है और अपने पुत्र को लोरियाँ सुनाती है । वह लड़का बड़ा होकर अपने लड़के से राग करने लगता है फिर वह अपने माता-पिता के कहने पर भी उनकी ओर नहीं आता ।

कोड़ा-कोड़ि द्रव्य / धन पाया, जिसकी तुलना सागर से की जाती है, उस पर शासन किया, आधिपत्य रखा पर मृत्यु आई तो कड़ी खीचड़ी खाई । मृत्यु के दिन जो भोजन किया जाता है वह विष समान कडुआ प्रतीत होता है ।

जिस शरीर का तू नित्य पोषण करता है वह निरन्तर सूखता जाता है । तू हार जाता है और वह जीत जाता है । द्यानतराय कहते हैं कि ओ मित्र! ऐसे में जो कुछ भजन, आत्म-चिंतन तेरे द्वारा किया जा सके वह ही तेरा है, अन्य कुछ भी तेरा नहीं है ।
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